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________________ ( ३ ) किसी भी प्रमाणसे बाधाको प्राप्त नहीं होता है, यह अच्छी तरह समझ सकते हैं । सम्यग्दर्शन आदिक लक्षणका विवेचन जीको लगता है । वह तो कण्ठाग्र करने योग्य भी है और कार्यान्वित करने योग्य भी । उनके परिश्रमको जनता आदरभाव से देखें । श्रीविद्वर्य पं. अजितकुमारजी शास्त्री - संपादक जैनगजट देहली. तत्वार्थसूत्र जैनदर्शनका प्रसिद्ध ग्रन्थ है । श्री विद्यानन्द आचार्यने इस सूत्र ग्रन्थपर संस्कृत भाषा में उच्च तार्किक ढंग से ' तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक ' नामक टीका ग्रन्थ लिखा है । श्लोकवार्तिक उच्च कोटिका न्यायका ग्रन्थ है, जो कि साधारण विद्वानों के अगम्य है । श्रीमान् तर्करत्न, सिद्धान्तमहोदधि, स्याद्वादवारिधि, न्यायदिवाकर पं. माणिकचंद्रजी न्यायाचार्य प्रसिद्ध तार्किक दार्शनिक विद्वान् हैं । आपने इस ग्रन्थका अध्यापन अनेक वार किया है । 1 दि. जैन समाजमें इस समय जो विद्वान दीख रहे हैं, उनमेंसे अधिकांश विद्वानोंने प्रमेयकमलमार्तण्ड, अष्टसहस्री तथा लोकवार्तिक ये तीनों उच्च कोटिके ग्रन्थ पूज्य पंडितजीसे अध्ययन किये हैं । अतः लोकवार्तिक पू. पंडितजीका बहुत अच्छा अभ्यस्त ग्रन्थ है । आपने इस ग्रन्थको संस्कृत भाषासे अनभिज्ञ विद्वानोंके लिये स्वाध्याय उपयोगी ग्रंथ बनाने के उद्देश्यसे इस दुर्बोधगद्दन ग्रन्थकी तत्त्वार्थचिंतामणी नामक सवालाख श्लोक प्रमाण सुन्दर सरल प्रामाणिक टीका लिखी है । संस्कृत भाषाको हिन्दी भाषामें अनुवाद करना कितना कठिन कार्य है, इसको भुक्तभोगी ही समझते हैं । फिर श्लोकवार्तिक जैसे महान् दार्शनिक तथा तार्किक संस्कृत ग्रन्थको हिन्दी भाषा में अनुवाद करना तो और भी अधिक कठिन कार्य है । इस दुष्कर कार्यको पूज्य पंडितजी ही कर सकते थे । पू. पंडितजीने श्लोकवार्तिककी टीका इस तन्मयतासे की हैं कि आपको इस तपस्या में अपनें सुखीजीवनके आधारभूत स्वास्थ्य की अनेक वर्षोंतक उपेक्षा करनी पडी । किन्तु इस कठिन परिश्रम के फलस्वरूप जो अनुपम साहित्यिक भेट जैन समाजको मिली हैं, वह सुदीर्घ कालतक पंडितजी साइबका नाम सादर अमर रक्खेगी तथा विज्ञ मानवसमाजको उच्चकोटीका मानसिक भोजन प्रदान करती रहेगी । यह टीका सरल, सुन्दर तथा प्रामाणिक है । प्रत्येक ग्रन्थभण्डार में छोकवार्तिककी यह टीका 1 तत्त्वार्थचिन्तामणी अवश्य विराजमान रहनी चाहिए । उपर्युक्त विद्वद्रत्नत्रयोंके सुसम्मति से हमारे पाठक इस प्रकाशनका महत्व, उपयोग, श्रम, श्रेय सब कुछ समझ सकते हैं। किसी भी प्रकाशनका महत्व व समादर विद्वान् ही कर सकते हैं । क्योंकि सामान्य जनताको वह दुर्बोध विषय है । विद्वानोने इस कृतिका सादर स्वागत किया है 1 इससे हम ग्रंथकार टीकाकर एवं प्रकाशकपरिवार के श्रमको सार्थक समझते हैं।
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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