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________________ तत्वार्थचिन्तामणिः सम्यग्ज्ञानके ईषत् अप्रमाणपनसे मिथ्याज्ञानमें अप्रमाणपन बहुत अधिक है। इस प्रकार हमारा पूर्वोक्त मन्तव्य सब का सब निर्दोष है, एक ज्ञानमें प्रमाणपन और अप्रमाणपनकी सिद्धि हो जाती है। कथमेकमेव ज्ञानं प्रमाणं वाप्रमाणं च विरोधादिति चेत् नो, असिद्धत्वाद्विरोधस्य । तथाहि । किसीका तर्क है कि एक ही ज्ञान भला प्रमाण और अप्रमाण भी कैसे हो सकता है ? क्योंकि इसमें विरोध दोष आता है । सज्जन भी कहीं दुर्जन हो सकता है क्या ? । आचार्य कहते हैं कि इस प्रकार तो न कहना। क्योंकि प्रमाणपन और अप्रमाणपनका एक स्थानपर विरोध होना असिद्ध है । हम क्या करें, तिस प्रकार उनका अविरोध प्रसिद्ध हो ही रहा है। सरसो विपरीतश्चेत् सरसत्वं न मुंचति । साक्षरा विपरीताः स्यू राक्षसा एव केवलं ॥ पंचमकालके कोई बुद्धिमान् भारी मूर्खताका कार्य कर बैठते हैं । घास खोदनेवाला छोकरा किसनईकी अनेक बातोंको जानता है । किन्तु अनेक बड़े राजनीतिज्ञ भी कोई गेंहू और जौके अंकुरका भेद ज्ञात नहीं कर पाते हैं। पंचमकालके कई धर्मात्मा अनेक रूपोंमें रंगे हुये पाये जाते हैं। कई डांकू और चोरोंने परस्त्रीका स्पर्शतक नहीं किया है । केवल माता या बहन कहकर उनके मूषण मात्र ले लिये हैं। बात यह है कि स्याद्वादसिद्धांतके अनुसार एकमें अनेक धर्म रह जाते हैं। केवल न्याय और सिद्धान्त विषयके उच्च कोटिका विद्वान् भी " भू" धातुके दश लकारोंमें शुद्धरूप नहीं ले पाता है । अच्छा वैयाकरण भी कोई साहित्यके विषयोंमें कोरा रह जाता है। प्रायः आजकल तो दोष और गुणोंका सामानाधिकरण्य अधिकतासे देखने में आता है। न चैकत्र प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे विरोधिनी । प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वे यथैकत्रापि संविदि ॥ ४६ ॥ एक ज्ञानमें प्रमाणपना और अप्रमाणपना विरोध दोषवाले नहीं हैं । जैसे कि बौद्धोंके यहां एक ज्ञानमें भी प्रत्यक्षपन और परोक्षपना ठहर जाता है । अर्थात्-सम्वेदनमें स्वकी सम्वित्ति होना अंश प्रत्यक्ष है । और सौत्रांतिकोंके यहां वेद्याकारपना तथा योगाचारोंके यहां वेद्याकाररहितपना रूप अंश उस ज्ञानमें परोक्ष माना गया है। एक अवयवी पदार्थ तलवार एक ओरसे पेंनी है। दूसरी ओरसे मोयरी है । पुरानी चालके दीपक या मसालके नीचे अंधेरा भी रहता है । विरोध तो अनुपलम्भसे साधा जाता है। किन्तु यहां दोनोंका एक स्थानपर उपलम्भ हो रहा है। ययोरेकसद्भावेऽन्यतरानिवृत्तिस्तयोर्न विरोधो यथा प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वयोरेकस्यां संविदि । तथा च प्रमाणत्वाप्रमाणत्वयोरेकत्र ज्ञाने ततो न विरोधः। जिन दोनोंमेंसे एकके विद्यमान होनेपर बचे हुये दूसरे एककी निवृत्ति नहीं हो पाती है, उनका विरोध नहीं माना जाता है । जैसे कि एक सम्वेदन में प्रत्यक्षपन और परोक्षपनका विरोध नहीं है । तिस ही प्रकार प्रमाणपन और अप्रमाणपनका एक ज्ञानमें तिस हेतुसे विरोध नहीं है । यह व्याप्ति बनाकर अनुमान द्वारा प्रमाणत्व और अप्रमाणत्वका अविरोध सिद्ध कर दिया है।
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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