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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः २१ सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके अपने सम्भवे हुये छह हजार बारह बारह जन्म मरण कर अन्तमें तीन मोडाकी गतिसे मरनेका प्रकरण प्राप्त होनेपर विग्रह गतिके पहले समय में सबसे छोटा जघन्य ज्ञान होता है । संक्लेशकी कुछ हीनता हो जानेसे दूसरे समयमें ज्ञान बढ जाता है । अक्षरके अनन्तवें भाग स्वल्पज्ञानका प्रारम्भ कर अनन्तवार छह वृद्धियोंके अनुसार अन्तिम प्रकर्षताको प्राप्त हुए केवलज्ञानतक अतिशय करके करके उनके मध्यरूपसे होनेवाले ज्ञानोंका तारतम्य किसीके द्वारा नहीं बाधित होता है । अर्थात्-गजभरके कपडेसे लेकर चालीस गजतकके थानमें मध्यवर्ती गजोंसे नपे हुये वस्त्र भी हैं । छटांकसे लेकर सेरभरतकके चूनमें मध्यवर्ती तौलोंका भी सद्भाव है । इसी प्रकार निरावरण जघन्य ज्ञान और केवलज्ञानके बीचमें होनेवाले देशप्रत्यक्षरूप अवधिमनःपर्यययोंकी सिद्धि हो जाती है । अथवा मति श्रुत और केवलज्ञानके मध्यवर्ती अबाध मनःपर्यय तो " तन्मध्यपतितस्तग्रहणेन गृह्यते " इस परिभाषाके अनुसार उपात्त हो जाते हैं । न ह्येवं संभाव्यमानमपि युक्त्यागमाभ्यामवध्यादिज्ञानत्रयमतींद्रियं प्रत्यक्षेण बाध्यते तस्य तदविषयत्वाच । नाप्यनुमानेनार्थापत्यादिभिर्वा तत एवेत्यविरोधः सिद्धः।। युक्ति और आगमोंके द्वारा इस उक्त प्रकार सम्भावना किये जा रहे भी अवधि आदिक तीन अतीन्द्रिय ज्ञान तुम्हारे वाहःइन्द्रियजन्य प्रत्यक्षों करके तो बाधित नहीं होते हैं । क्योंकि वह इन्द्रिय प्रत्यक्ष उन अतींद्रिय ज्ञानोंको विषय नहीं करता है । जो ज्ञान जिसको विषय नहीं करता है, वह उसका साधक या बाधक नहीं होता है । जैसे कि चाक्षुष ज्ञानका बाधक रासन ज्ञान नहीं होता है । तथा अनुमान प्रमाण करके अथवा अर्थापत्ति, उपमान, आदि प्रमाणों करके भी तिस ही कारण यानी उनको विषय करनेवाले न होनेसे अवधि आदि तीन प्रत्यक्षोंको बाधा प्राप्त नहीं होती है । इस प्रकार अतीन्द्रिय प्रत्यक्षके साथ अनुमान आदि प्रमाणोंका अविरोध सिद्ध होगया । समीचीनज्ञान तो परस्परमें विरोधको नहीं रखते हुये प्रत्युत सहायक हो जाते हैं। प्रमाणसंप्लव माना गया है । तथा प्रमाणोंकी भी प्रमाणोंसे ही सिद्धि होती है। एक रोगीकी चिकित्सा सुमतिवाले अनेक वैद्य कर सकते हैं । तथा वैद्यके बीमार होनेपर अन्य वैद्योंसे उसकी चिकित्सा ( इलाज ) की जाती है। ____ कश्चिदाह, मतिश्रुतयोरेकत्वं साहचर्यदेकत्रावस्थानादविशेषाञ्चेति तद्विरुद्ध साधनं तावदाह। ___कोई स्पष्टवक्ता प्रश्न कर रहा है कि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान दोनों साथ साथ रहते हैं । और एक आत्मामें दोनों अवस्थान करते हैं, तथा दोनोंमें कोई विशेषता भी नहीं है । इन हेतुओंसे मति और श्रुतका एकपना हो जाओ । इस प्रकार कह चुकनेपर सबसे पहले आचार्य यह स्पष्ट दोष कहते हैं कि मति और श्रुतके अभेदको साधनेवाले हेतु विरुद्ध है । सुनिये
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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