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________________ तत्वार्थ लोकवार्तिके था कि प्रमाण ( पक्ष ) हैं ( साध्य ) । क्योंकि इष्ट पदार्थोंकी सिद्धि हो रही है ( हेतु) । यहांतक अद्वैतवादी या शून्यवाद के सन्मुख प्रमाणतत्त्वकी सिद्धिका प्रकरण समाप्त हुआ । १३१ • एवं विचारतो मानस्वरूपे तु व्यवस्थिते । तत्संख्यानप्रसिद्ध्यर्थं सूत्रे द्वित्वस्य सूचनात् ॥ १४६ ॥ इस प्रकार उक्त विचार करनेसे प्रमाणका स्वरूप व्यवस्थित हो जानेपर तो उस प्रमाणकी संख्याकी प्रसिद्धि के लिये " तत्प्रमाणे " इस सूत्र में द्विवचन " औ " विभक्तिके द्वारा प्रमाणके दो पका सूचन किया गया है । तत्प्रमाणे, इति हि द्वित्वनिर्देशः संख्यांतरावधारणनिराकरणाय युक्तः कर्तुं तत्र विप्रतिपत्तेः । " तत्प्रमाणे " इस प्रकार सूत्रमें नियमसे द्विवचनपनेका कथन करना तो अन्य नैयायिक, मीमांसक, आदि द्वारा मानी गयीं प्रमाणोंकी संख्याओं के नियमको निवारण करनेके लिये किया जाना समुचित है । क्योंकि उस प्रमाणकी संख्यामें अनेक वादियोंका विवाद पडा हुआ था । 1 प्रमाणमेकमेवेति केचित्तावत कुदृष्टयः । प्रत्यक्षमुख्यमन्यस्मादर्थनिर्णीत्यसंभवात् ॥ १४७ ॥ तिन विवाद करनेवालोंमें कोई चार्वाक मिध्यादृष्टि तो इस प्रकार कह रहे हैं कि प्रमाण एक ही है । सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मुख्य प्रत्यक्ष प्रमाण है। क्योंकि अन्य अनुमान, आगम आदिसे अर्थका निर्णय होना असम्भव है । प्रमाणका सबसे पहिले अर्थका निर्णय करना फल है । अनुमान आदिसे विशेष तथा अर्थोका निर्णय नहीं हो पाता है । सामान्य रूपसे अनि आदिकको तो व्याप्तिज्ञानके समय ही जान लिया जाता है । वाध्य अर्थके शद्वजन्य आगम ज्ञानमें भी अनेक न्यूनता अधिकतायें हो जाती हैं । अतः प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है । प्रत्यक्षमेव मुख्यं स्वार्थनिर्णीतावन्यानपेक्षत्वादन्यस्य प्रमाणस्य जन्मनिमित्तत्वात् न पुनरनुपादि तस्य प्रत्यक्षापेक्षत्वात् प्रत्यक्षजननानिमित्तत्वाच्च गौणतोपपत्तेः न च गौणं प्रमाणमतिप्रसंगात् । ततः प्रत्यक्षमेकमेव प्रमाणमगौणत्वात् प्रमाणस्येति केचित् । प्रत्यक्ष ही मुख्य प्रमाण है, क्योंकि अपने और अर्थके निर्णय करनेमें उसको अन्यकी अपेक्षा नहीं है । दूसरा हेतु यह है कि प्रत्यक्ष ही अन्य अनुमान आदि प्रमाणोंके जन्मका निमित्त है । अतः प्रत्यक्ष ही मुख्य प्रमाण है। फिर अनुमान, उपमान, आदिक ज्ञान मुख्य नहीं हैं । क्योंकि 1 उनको प्रत्यक्षकी अपेक्षा होनेके कारण तथा प्रत्यक्षके जन्मका निमित्तपना नहीं होनेके कारण गौणपना प्रसिद्ध हो रहा है । किन्तु गौण पदार्थ तो प्रमाण नहीं होता है । क्योंकि यों तो अति
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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