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________________ तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिके परलोकप्रसिध्द्यर्थमनुष्ठानं प्रमाणतः । सिद्धं तस्य बहुक्लेशवित्तत्यागात्मकत्वतः ॥ १२२ ॥ इति ब्रुवन् महायात्राविवाहादिषु वर्तनम् । संदेहादभिमन्येत जाड्यादेव महत्तमात् ॥ १२३ ॥ परलोककी प्रसिद्धिके लिये दीक्षा, वनवास, उपवास, परीषहसहन, ब्रह्मचर्य, आदि अनुष्ठान करना प्रमाणोंसे सिद्ध है। क्योंकि वह अनुष्ठान अधिकक्लेश, धनत्याग, स्त्रीपुत्रनिवारण-स्वरूप है। जब कि अत्यन्त परोक्ष परलोकके लिये प्रमाणोंसे साधे गये अनुष्ठानमें प्रवृत्ति होना मानते हो किन्तु बडी यात्रा, विवाह, धनअर्जन, अध्ययन, आदिकमें संदेहसे प्रवृत्ति करना अभिमानपूर्वक अभीष्ट करते हो, आचार्य कहते हैं कि यों कह रहा एकान्ती पुरुष महामूर्ख है । इसमें बहुत बढी हुई जडता ही कारण कही जा सकती है । तत्त्व यह है कि संशयसे परीक्षकोंकी अर्थ, अनर्थमें प्रवृत्ति, निवृत्ति होना अशक्य है । नैयायिक लोग आत्माको ज्ञानस्वरूप नहीं मानते हैं । आत्मामें ज्ञान न्यारा पड़ा रहता है । यह नैयायिकोंके आत्माकी जडता है। तथा महायात्रा आदिमें संशयसे प्रवृत्ति मानना तो महाजडता है। बढ रही, जडतासे ही कोई मनुष्य व्याघात दोषयुक्त विषयको बक देता है। परलोकार्थानुष्ठाने महायात्राविवाहादौ च बहुक्लेशवित्तत्यागाविशेषेपि निश्चितपामाण्याद्वेदनादेकनान्यत्र वर्तनं संदेहाच स्वयमाचक्षाणस्य किमन्यत्कारणमन्यत्र महत्तमाजाड्यात् । एकत्र परस्पराश्रयस्यान्यत्र प्रामाण्यव्यवस्थापनवैयर्थ्यस्य च तदवस्थत्वात् । परलोकके अर्थ नित्य कर्म, नैमित्तिक कर्म, दीक्षा, तपस्या, आदि कर्मोके अनुष्ठान करनेमें और महायात्रा संघ चलाना, विवाह, प्रतिष्ठा कर्म आदिमें बहुत क्लेश और धनत्यागके विशेषतारहित हुये भी एकस्थलपर यानी परलोकके लिए तो प्रामाण्यनिश्चयवाले वेदनसे प्रवृत्ति होना कह रहे हैं। तथा दूसरे स्थलपर विवाह आदिमें नैयायिक लोग स्वयं संदेहसे प्रवृत्ति होनेको बखान रहे हैं। उनके इस कथनमें अधिक बढ़ी हुई जडताके अतिरिक्त दूसरा क्या कारण कहा जाय ? एक स्थान पर अन्योन्याश्रय दोष और दूसरे स्थानपर प्रमाणपनेकी व्यवस्था करानेका व्यर्थपना दोष वैसाका वैसा ही अवस्थित रहेगा। भावार्थ-प्रमाणपनेके निश्चयवाले ज्ञानसे परलोकके उपयोगी अनुष्ठानोंमें प्रवृत्ति होना माननेसे अन्योन्याश्रय दोष आता है । जैसा कि पूर्वमें कहा जा चुका है । और संदेह से प्रवृत्ति होना माननेसे ज्ञानोंमें प्रमाणपनका ढूंढना व्यर्थ पडता है। तस्मात्प्रेक्षावतां युक्ता प्रमाणादेव निश्चितात् । सर्वप्रवृत्तिरन्येषां संशयादेरपि कचित् ॥ १२४ ॥ ..
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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