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________________ २४४ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके हैं। यदि शद्बका वाच्य कोई वस्तुभूत पदार्थ न होता तो आपके बुद्ध भगवान् भला किसका उपदेश देते हैं ? बतलाओ ! और यों तो आपके पिटकत्रय, न्यायबिन्दु, आदि ग्रन्थ निरर्थक हो जावेंगे । नहि शब्द वाच्यवस्तुभूतपदार्थमन्तरा मूकाद्वाग्मिनोवा विशेषं पारयामः ॥ अलम् । शद्धो विवक्षां विधत्ते न पुनर्बहिरर्थमित्यभ्युपगमे कथमन्यापोहकृत्सर्वः शद्धः सर्वथा । फिर भी बौद्ध कहते हैं कि शब्द वक्ताकी इच्छाका विधान करता है, अर्थात् किसीने घट शद्वको कहा । वह घट शब्द्ध घट बोलनेकी इच्छाको कह रहा है, उसको घटशब्द कहनेकी कहास थी हां ! वटशब्द कम्बुग्रीवा आदिसे युक्त व्यक्तिको नहीं कहता है । इसी प्रकार सभी शब्द बोलनेवालेकी इच्छाको कह रहे हैं, किन्तु फिर बहिरंग अर्थोको नहीं कहते हैं । अब आचार्य कहते हैं कि ऐसा स्वीकार करनेपर बौद्धोंके यहां सभी शर सब प्रकारसे अन्योपोहको करनेवाले कैसे हो सकेंगे ? भावार्थ-जब शद्ब विवक्षाका विधान करने लगे तो अन्यापोहरूप अभावको कैसे कह सकेंगे ? बतलाओ ! आपके हाथसे एकान्तपक्ष निकल गया । वक्तुरिच्छां विधत्तेऽसौ बहिरर्थं न जातुचित् । शवोऽन्यापोहकृत्सर्वः यस्य वाध्यविजृम्भितम् ॥ ४४ ॥ जिस बौद्धके यहां वह शब्द वक्ताकी इच्छाका विधान कर रहा है और कभी भी बहिर्भूत अर्थका विधान नहीं करता है, उसके यहां सभी शब्द अन्यापोहका कथन कर रहे हैं, यह कहना बन्ध्यापुत्रकीसी चेष्टा करना है अथवा अर्थ उपहास कराना है। ___ यथैव हि शद्धेन बहिरर्थस्य प्रकाशने तत्र प्रमाणान्तरा वृत्तिः सर्वात्मना तबेदनेनार्थस्य निश्चितत्वानिश्चिते समारोपाभावात् । तद्यवच्छेदेऽपि प्रमाणान्तरस्यामवृत्तेर्वस्तुनो धर्मस्य कस्यचिनिश्चये सर्वधर्मात्मकस्य धर्मिणो निश्चयात्सर्वग्रहापत्तेरन्यथा तदात्मकस्यैकधर्मस्यापि निश्चयानुपपत्तिस्ततो भिन्नस्य धर्मस्य निश्चये धर्मिणि प्रवृत्त्यघटनात् तेन तस्य संबन्धाभावादनुपकार्योपकारकत्वात् । तदुपकारे वा धर्मोपकारशक्त्यात्मकस्य धर्मिणो धर्मद्वारेण शद्भाव प्रतिपत्तौ सकलग्रहस्य तदवस्थत्वात्तदुपकारशक्तेरपि ततो भेदेनानवस्थानात् । प्रत्यक्षवद्वस्तुविषयस्य शद्धप्रत्ययस्य स्पष्टप्रतिभासप्रसंगाच्च न शद्धस्य तद्विषयत्वं तथैव वक्तृविवक्षायाः शब्देनाभिधाने विशेषाभावात् । न च तत्र प्रमाणान्तरा वृत्तिरेवाभ्युपगन्तं युक्ता शद्धारसामान्यतः प्रतिपन्नायामपि तस्यां विशेषसंश्रयात् प्रमाणान्तरवृत्तेरेव निश्चयात् ततो वक्तुरिच्छायां बहिरर्थवच्छब्दस्य प्रवृत्त्यसम्भवेऽपि तामेव शब्दो विदधातीति कथं वाध्यविजृम्भितं, सर्वशब्दानामन्यापोहकारित्वप्रतिज्ञानात् ।
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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