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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः १३७ हो जावेगी । यह अनुमान प्रकरणमें माने हुए विपर्ययका पारिभाषिक अर्थ है, जैसे कि कोई मनुष्य अपने पास चांदीके न्यारे न्यारे पचास रुपयेके अभावको तो स्वीकार करे किन्तु पृथक् पृथक् सौ (१००) रुपयोंका अभाव न माने, उस मूढको समझाया जाता है कि पचास के बिना सौ नहीं हो सकते हैं पचास ही नहीं तो भला सौ कैसे हो सकते हैं ? जो मनुष्य ही नहीं वह ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? इसी प्रकार अद्वैतवादी पण्डित अन्य पुरुषोंके प्रत्यक्षमें अपनी अपनी न्यारी न्यारी आत्माओं का विधायकपनारूप व्यापकका तो अभाव मानते हैं । किन्तु व्याप्यरूप प्रत्यक्षपनेका अभाव नहीं मानते हैं, उनको व्यापककी निवृत्ति होनेपर व्याप्यकी निवृत्तिका अवश्य होना सुझाया जाता है । व्यापक का अभाव व्याप्य होता है, और व्याप्यका अभाव व्यापक होता है। जैसे कि बह्निका अभाव व्याप्य ( अल्प देशवृत्ति ) है । और धूमका अभाव व्यापक ( बहुदेशवृत्ति ) है । अतः विपर्यय के द्वारा आत्माके एकत्वकी सिद्धि नहीं हो सकेगी । भावार्थ - प्रत्येक आत्मामें स्वसंवेदन प्रत्यक्ष अपने अपने न्यारे न्यारे ब्रह्मको जान रहे हैं । अतः आत्माओंके अनेकपनेकी सिद्धि हो जाती है । अथवा आत्माके एकपनकी सिद्धि कैसे भी नहीं हो सकती है । 1 न च विधायकमेव प्रत्यक्षमिति नियमोऽस्ति, निषेधकत्वेनापि तस्य प्रतीयमानत्वात् । तथाहि और अद्वैतवादियोंका इस प्रकार नियम करना कि प्रत्यक्षप्रमाण विधायक ही है, निषेधक नहीं है, ठीक नहीं है। क्योंकि वह प्रत्यक्षप्रमाण निषेधकपने करके भी प्रतीत होरहा है । घर भूतलमें घटके निषेधको भी प्रत्यक्ष द्वारा जान लिया जाता है । इसी वातको युक्तियों से सिद्ध कर कहते हैं, एकाग्रचित होकर सुनिये । 1 विधात्रहं सदैवान्यनिषेध्द् न भवाम्यहम् । स्वयं प्रत्यक्षामित्येवं वेत्ति चेन्न निषेध्दकम् ॥ ३९ ॥ यदि प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं इस प्रकार जानता है कि मैं सदा ही आत्माका विधान करनेवाला हूं । अन्यका निषेध करनेवाला नहीं होता हूं। ऐसा कहनेपर तो वह प्रत्यक्ष क्यों नहीं निषेध करनेवाला होगा ? अर्थात् निषेध करनेवाला नहीं हूं यही तो निषेध है । निषेध करनेवालेपनका निषेध भी निषेधक प्रमाणसे होगा । सर्वथा विधायकसे नहीं । ऐसी दशामें प्रत्यक्षको निषेधकपना प्राप्त होजाता है । विधातृ च नान्यनिषेध्दृप्रत्यक्षमिति न प्रमाणान्तरान्निश्चयो द्वैतप्रसंगात् । स्वत एव तथा निश्वये सिद्धं तस्य निषेधकत्वं परस्य निषेध्न्द्रहं न भवामीति स्वयं प्रतीतेः । हम अद्वैतवादियोंसे पूंछते हैं कि आपका माना हुआ प्रत्यक्ष विधिको करनेवाला है और अन्यका निषेध करनेवाला नहीं है । इस बातको आप प्रत्यक्षप्रमाणसे अतिरिक्त दूसरे प्रमाणोंसे तो निश्चय नहीं कर पायेंगे । क्योंकि दूसरे प्रमाण माननेपर तो आपको द्वैत माननेका प्रसंग होगा । 18
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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