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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः है। सार्थक वचन जीवके समझानेके लिये ही कहे जाते हैं। अजीव, आस्रव, आदिकी विधि भी जीव नामक प्रभुके लिये ही है। तदुपग्रहहेतुत्वादजीवस्तदनन्तरम् । तदाश्रयत्वतस्तस्मादास्त्रवः परतः स्थितः ॥ २१ ॥ बन्धश्चास्रवकार्यत्वात्तदनंतरमीरितः । तत्प्रतिध्वंसहेतुत्वात्संवरस्तदनन्तरम् ॥ २२ ॥ संवरे सति सम्भूतेर्निर्जरायास्ततः स्थितिः । तस्यां मोक्ष इति प्रोक्तस्तदनन्तरमेव सः ॥ २३ ॥ उस जीवके शरीर, मन, श्वासोछास, गमन, स्थिति, अवगाह, वर्तना, रूप उपकारोंका कारण होनेसे उस जीवके अनन्तर अजीवका कथन किया है । यहां उपकार्य उपकारकभाव सम्बन्ध है। उन जीव और अजीवके आश्रयपनेसे आस्रव होता है । तिस कारण अजीवसे परली ओर आस्रव पद ठहरा हुआ है । यहां आश्रयण आश्रयिभाव सम्बन्ध है । तथा आस्रवका कार्य बन्ध है अतः सूत्रमें उस आस्रवके अनन्तर बन्ध कहा गया है आस्रव और बन्धमें कार्यकारण भाव संगति है । आस्रवके प्रतिकूल उस आस्रवके ध्वंसका अथवा बन्धके अभावका कारण होनेसे उस बन्धके पछि संवरका प्रयोग किया गया है । यहां प्रतिनारायण नारायणके समान अथवा राम रावणके सदृश प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भावसम्बन्ध है । संवरके हो जानेपर मोक्षके उपयोगी होरहा निर्जरातत्त्व भले प्रकार उत्पन्न होता है। तिस कारण तिस संवरके पीछे निर्जरा कही गयी है। यहांपर पूर्वापरभाव या प्रयोज्य प्रयोजकभाव सम्बन्ध व्यवस्थित है। उस निर्जराके हो जानेपर मोक्ष होती है। इस कारण उसके अनन्तर ही प्रसिद्ध मोक्ष तत्त्व कहा गया है। यहां कार्यकारणभाव सम्बन्ध है। इस प्रकार सात तत्त्वोंके क्रमसे कथन करनेमें सूत्रकारका स्वरस ( अभिप्राय ) प्रगट कर दिया है । जीवादिपदानां द्वन्द्ववृत्तौ यथोक्तः क्रमो हेतुविशेषमपेक्षतेऽन्यथा तनियमायोगात् । तत्र जीवस्यादौ वचनं तत्त्वोपदेशस्य जीवार्थत्वात् ।। जीव आदि पदोंकी द्वन्द्वसमास नामक वृत्तिके होनेपर शास्त्रमें यथार्थरूपसे कहा गया जो क्रम है ( पक्ष ) है सो विशेष हेतुओंकी अपेक्षा रखता है ( साध्य ) यदि ऐसा न माना जाकर दूसरे प्रकारसे माना जावेगा तो पदोंके ठीक ठीक आगे पीछे बोलनेका नियम नहीं नहीं बन सकेगा ( हेतु )। अर्थात् कोई भी पद कहीं भी बोला जासकेगा। कुछ भी व्यवस्था नहीं हो सकेगी । एक व्याख्याता या वाक्कील ( वकील ) भी अपने वक्तव्य प्रमेयको ठीक संदर्भसे बोलता हुआ ही सुनने वालोंपर प्रभाव जमा सकता है । मोतियोंकी कण्ठीमें या रत्नमालामें योजना समीचीन होनी चाहिये।
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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