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________________ * अस्वरसीज विभावनम् * ताप्येण तदविषयस्याऽहेतुत्वान्न तत्प्रत्यक्षमित्यतये । 'विषयतया प्रत्यक्षमात्रकारणीभूतगुरुत्वाधन्यतमभेदाभावादि'त्रापरे । -= -=- =* नायलता * अत्रेवाऽन्येषां मतमाह- ताद्रूप्येण = विषयात्मना तद्विपयस्य = नित्यप्रत्यक्षगोचरस्य परमावादेः, अहेतुत्वात् = नित्यप्रत्यक्षाऽजनकत्वात् न तत्प्रत्यक्षं = नित्यैकप्रत्यश्नगोचरोऽनुव्यवसायात्मको मानससाक्षात्कारः इत्यन्ये मनीषिणो ब्याचक्षते । 'अयं घट' इत्याद्यनित्यप्रत्यक्ष घटात्मना घटस्य कारणत्वम् । तस्य विषयविधया घटजन्यत्वेन 'मया ज्ञातो घटः' 'अहं घटं जानामी' त्याद्याकारको नुव्यवसायो भवति । ज्ञानप्रत्यक्षे ताद्रूप्येण स्वविषयजन्यत्वस्यैव नियामकत्वात् जीवात्मवृत्तिनित्यप्रत्यक्षे ताद्रूप्येण स्वविषयजन्यत्वस्य बिरहादेव न तन्मानससाक्षात्कार इति निर्गलितार्थः । अन्य इत्यमेनाऽस्वरसप्रदर्शनमं कृतम् । निर्विकल्पप्रत्यक्षे ताद्रूप्येण विषयजन्यत्वस्य सत्त्वेऽपि न तदनुज्यवसायो भवति । न च ताद्रूप्येण स्वविषयजन्यत्वे सति वैशिष्ट्यावगाहित्वस्मैव ज्ञानप्रत्यक्ष नियामकत्वमस्तु, निर्विकल्पके तु विशेष्याऽभावप्रयुक्तविशिष्टाभावात्र प्रत्यक्षमिति वाच्यम्, एवं सति विशेषणविशेष्यभावे विनिगमनाविरहेणाऽतिगौरवात. विशेष्यस्यैव नियामकत्वसम्भवे व्यर्थविशेषणघटितत्वेन व्याप्यत्वासिद्भयापत्तेः । न च विशेष्यस्यैव नियामकत्वमस्तु लाचवात्, अवश्यक्लृप्तत्वाच्चेति वाच्यम्, तथा सति जीवात्मवृत्तिनित्य- | प्रत्यक्षगोचरानुव्यबसायस्य वज्रलेपायमानत्वप्रसङ्गात, तस्य वैशिष्ट्यावगाहित्यात् । अत्रवाऽपरेषामभिप्रायमाह- विषयतया प्रत्यक्षमात्रकारणीभूतगुरुत्वाद्यन्यतमभेदाभावात् न जीवात्मवृत्तिनित्यप्रत्यक्षस्य मानससाक्षात्कार इति शेषः । इदमत्र तत्त्वम्, विषयतासम्बन्धेन प्रत्यक्षत्वावन्छिन्नं प्रति स्वरूपसम्बन्धेन गुरुत्वादृष्टपरमाणुपिशाचादिभेदस्य हेतुत्वनियमः । यथा स्वरूपसम्बन्धेन गुरुत्वाद्यन्यतमत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदवति घटे विषयतासम्बन्धेन घटप्रत्यक्षं जायते । गुरुत्वादी स्वरूपसम्बन्धेन गरुत्वाद्यन्यतमत्वस्य सत्त्वेन तदवच्छिन्न प्रतियोगिताकभेदविरहान्न तत्र विषयता है, सिद्ध होने से क्या ? इतने से ही नित्य प्रत्यक्ष का मानस साक्षात्कार का आपादन नहीं किया जा सकता, क्योंकि द्वित्वजनकतावच्छेदकीभूत लौकिकविषयितामात्र ज्ञानप्रत्यक्ष में नियामक नहीं है । ज्ञान के प्रत्यक्ष में तो इन्द्रियसन्निकर्यादि जन्यतावच्छेदकीभूत लौकिकविषयता ही नियामक है। जो प्रत्यक्ष ज्ञान इन्द्रियसत्रिकर्ष से जन्य होता है, उसमें रहने वाली लौकिकविषयिता इन्द्रियसन्निकर्ष की जन्यतावदक होती है । तादृश लौकिक विषयिता के आश्रयीभूत ज्ञान का ही मानस साक्षात्कार हो सकता है जैसे 'अयं घटः' इत्याकारक लौकिक व्यवसाय ज्ञान का 'अहं घटं जानामि' इत्यागाकारक मानस प्रत्यक्ष । मगर नित्य प्रत्यक्ष तो जन्य ही नहीं होने से इन्द्रियसन्निकर्पादि की जन्यतावच्छेदकीभूत बिलक्षण लौकिक विषयिता उसमें नहीं रहती है। अतएव उसके मानस साक्षात्कार का आपादन नहीं किया जा सकता। आपादक से शून्य में किसके बल पर अनिष्ट आपादन किया जाय ? अतः नित्य प्रत्यक्ष को प्रत्येक जीवात्मा में समवेत मानने पर भी उसके मानस साक्षात्कार का अनिष्ट प्रसंग अप्रसक्त है ।" < ताट्रायण, इति । अन्य विद्वान प्रत्येक जीवात्मा में समवेत नित्य प्रत्यक्ष के मानस साक्षात्कार के निवारणार्थ यह कहते हैं कि → "जिस ज्ञान का विषय ताप्य से हेतु होता है, उस ज्ञान का प्रत्यक्ष हो सकता है । जैसे घटचाक्षुष के प्रति घट घटात्मना हेतु होने से 'अयं घटः' इस चाक्षुप का 'अहं घटं पश्यामि' इत्याकारक अनुव्यवसाय = मानस साक्षात्कार होता है । जीवात्माओं में समवेत नित्य प्रत्यक्ष के प्रति परमाणु आदि विषय परमाण्वादिरूप से विषयविधया हेतु ही नहीं होते हैं। अतः प्रत्येक जीवात्मा में समवेत नित्य प्रत्यक्ष के मानस साक्षात्कार की आपत्ति नहीं दी जा सकती। अतः नित्य प्रत्यक्ष के आश्रयरूप में ईश्वरात्मा की कल्पना करनी उचित नहीं है।' < * गुरुत्वादि अन्यतमभेद ही प्रत्यक्ष का नियामक - मतविशेषनिस्पप * विषयतया, इति । अपर विद्वानों का यह वक्तव्य है कि . 'विषयतासम्बन्ध से प्रत्यक्ष के प्रति स्वरूपसम्बन्ध से गुरुत्व आदि अन्यतम का भेद कारण होता है। आदि पद से अदृष्ट (पुण्य, पाप) नित्य प्रत्यक्ष आदि का ग्रहण अभिमत है । गुरुत्व, पुण्य, पाप आदि का कभी प्रत्यक्ष. नहीं होता है । अतः जो गुरुत्वादि से भिन्न हो उसीका प्रत्यक्ष होता है। जैसे घटप्रत्यक्ष विषयतासम्बन्ध से घट में उत्पन्न होता है और स्वरूपसम्बन्ध से तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक मुरुत्वायन्यतमत्वावच्छिमप्रतियोगिताक भेद भी घट में रहता है। घट गुरुत्व, पुण्य, पाप आदि से भिन्न ही होता है। यहाँ कार्यताअवच्छेदकसम्बन्ध विषयतासम्बन्ध है । उपर्युक्त भेदनिष्ट कारणता का अवच्छेदक स्वरूप सम्बन्ध है। गुरुत्व आदि में विषयतासम्बन्ध से प्रत्यक्ष उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि गुरुत्व में तादात्यसम्बन्धावच्छिन-गुरुत्वाद्यन्यतमत्वावच्छिनप्रतियोगिताक भेद स्वरूप
SR No.090487
Book TitleSyadvadarahasya Part 2
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages370
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size17 MB
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