SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 144
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३४१ मध्यमस्याद्वादरहस्ये खण्डः २ का. ५ * स्वाभाविकत्वनिर्वचनाऽसम्भवः * अथ अजेनाद्यसंस्कृतचक्षुर्जन्यत्तं तदिति चेत् ? न. आदिपदार्थाननुगमेन कार्यतावच्छेदकाननुगमात् । 'आलोकेतराऽसंस्कृतचक्षुर्जन्यत्वं तदिति चेत् ? न, आलोकेतरस्याऽजनादेव्यभिचारेण चाक्षुषाऽजनकत्वेन चक्षुरसंस्कारकत्वात् । * जयलवा तादृशचाक्षुषस्य विजातीयत्वान्नायं दोष इति वक्तव्यम्, तस्य तथात्वे मानाभावात् 'पश्यामीत्यनुव्यवसायानुपपत्तेः गौरवाच । साम्प्रतं परी गत्यन्तरेण स्वाभाविकत्वं निरूपयति अथेति । चेदित्यनेनाऽस्याऽन्वयः । अञ्जनाद्यसंस्कृतचक्षुर्जन्यआलोककार्यतावच्छेदकधर्मघटकीभूतं स्वाभाविकत्वम् । स्थाद्वादी तन्निराकुरुते नेति । आदिपदार्थाननुगमेन अञ्जनपदोत्तरादिपदार्थेष्वनुगत धर्मविरहेण कार्यतावच्छेदकाननुगमात् = आलोकसंयोगकार्यतावच्छेदकधर्मस्य तद्घटितस्याऽननुगमात्, नियतधर्मावच्छिन्नकार्यतानिरूपितकारणताया आलोकसंयोगेऽसम्भवान्नैतादृशः कार्यकारणभावो घटामञ्चतीति स्याद्वादिनोऽभिप्रायः । पर आह- आलोकेतरासंस्कृतचक्षुर्जन्यत्वं = आलोकेतरा सहकृतचक्षुर्जन्यत्वं तत् = आलोकसंयोगकार्यतावच्छेदकधर्मघटकीभूतं स्वाभाविकत्वम् । आलोकेतरत्वेनाऽ अनादीनामनुगमात्र तदननुगमप्रयुक्तकार्यतावच्छेदकधर्माननुगमो न वा व्यतिरेकव्यभिचारावकाशः, अञ्जनादिसहकृतचक्षुषां चीरादीनां चाक्षुषे आलीकेतराऽ सहकृतचक्षुर्जन्यनरसमवेतचाक्षुषत्वलक्षणस्य कार्यतावच्छेदकस्य विरहादिति नैयायिकाशयः । त्वं तत् 11 - = नन्वालोकेतराऽसहकृतत्वं चक्षुषः किं स्वरूपविशेषणं यदुत व्यावर्तकविशेषणं १ इति विकल्पयुगलीस मवतीर्यते । तत्र नायः क्षोदक्षम:, तस्य कार्यतावच्छेदकधर्मघटकत्वायोगात् पर्धगौरवात् व्यतिरेकव्यभिचारस्य तदवस्थित्वाच्च । नापि द्वितीय: समीचीनः, आलोकेतरस्याऽअनादे: चाक्षुषं प्रति चक्षुः सहकारिकारणत्वविरहात्, अञ्जनादिकमृतेऽपि चाक्षुषस्य जायमानत्वेन व्यतिरेक्यभिचारादित्याशयेन स्याद्वादी तन्निराकुरुते नेति । व्यभिचारेण व्यतिरेकव्यभिचारेण चाक्षुषत्वावच्छिन्नाऽव्यवहितनियतपूर्ववर्तित्वाभावेनेति यावत् । चाक्षुषाऽजनकत्वेन चाक्षुषत्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपितकारणत्वासम्भवेन, चक्षुरसंस्कारत्वात् = चक्षु: सहकारिकारणत्वायोगात् । घटं प्रति यथा दण्डस्य कुलालसहकारित्वं भवति तथा चाक्षुषं प्रति नाञ्जनाधर्म के घटकीभूत स्वाभाविकत्व के घटकविधया आलोकसहकारित्व = आलोककारणत्व आलोकनिष्ठ चाक्षुपसहकारिकारणत्व का ग्रहण करते हैं । यह कैसे संगत हो सकता है ? अभी तक स्वाभाविकत्व भी असिद्ध है और आलोकवृत्ति चाक्षुपसहकारिकारणता भी असिद्ध है । तब असिद्ध से असिद्ध की सिद्धि कैसे हो सकेगी ? तथा आलोकसहकृतचक्षुजन्यत्व से अतिरिक्त अन्यस्वरूप भी स्वाभाविकत्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य पदार्थ का निरूपण करना नैयायिक मनीपी के लिए लोहे के चने चबाना जैसा मुश्किल है । = अथा. इति । यदि नैयायिक की ओर से यह कहा जाय कि “स्वाभाविकत्वपद का अर्थ है अंजनादि से असंस्कृत चक्षु से जन्यत्व | अञ्जनादि पदार्थ तो प्रसिद्ध है । अतः उसका स्वाभाविकत्व के घटकविधया निवेश हो सकता है। अंजनादि के सहकार से चौरादि को जो चाक्षुष साक्षात्कार, आलोकसंयोग के बिना होता है, वह अंजनादिसंस्कृतचक्षुजन्यनरचाक्षुप होने से अंजना संस्कृतचक्षुजन्यत्वविशिष्टनरचाक्षुषत्वस्वरूप आलोकसंयोगकार्यतावच्छेदक धर्म से रहित होने से उसकी उत्पत्ति, बिना आलोकसंयोग के हो तो भी व्यतिरेक व्यभिचार दोष का अवकाश नहीं है, क्योंकि वह आलोकसंयोग का कार्य ही नहीं है" तो यह भी गलत है । इसका कारण यह है चक्षु में संस्कारविशेष का आधान केवल अंजन से ही नहीं होता है, किन्तु रसायन, गुटिका, मणि आदि से भी होता है । वे कितने हैं ? यह अनिश्चित है। अतः 'अञ्जनादि' पद में जो आदिशब्द है, उसका अर्थ अननुगत होने से उससे घटित आलोकसंयोगकार्यतावच्छेदक धर्म भी अननुगत बन जायेगा । तब तो अनेक कार्य कारणभाव का स्वीकार आवश्यक बनने पर महागौरव होगा या तो व्यभिचार होगा । इसलिए आलोकसंयोग का कार्यतावच्छेदक धर्म अंजनाग्रसंस्कृतचक्षुजन्यत्वविशिष्टनरवृत्तिचानुपसाक्षात्कारत्व नहीं हो सकता है । कार्यतावच्छेदक धर्म अनिश्रित होने पर उससे अवच्छिन्न = नियन्त्रित कार्यता भी अप्रसिद्ध बनेगी । जब कि तादृश कार्यता अप्रसिद्ध है, तब उससे निरूपित कारणता भी आलोकसंयोग में कैसे रहेगी, जिसके फलस्वरूप में आलोकसंयोग को कारण माना जा सके। आलोकेतराऽसंस्कृतचक्षुजन्यत्व स्वाभाविकरूप नहीं है - स्यादादी = = आलोकेत इति । यदि नैयायिक की ओर से यह कहा जाय कि "आलोककार्यतावच्छेदकपटकीभूत स्वाभाविकत्व का अर्थ है आलोकेतर से असंस्कृत असहकृत चक्षु से जन्यत्व | अतः कार्यतावच्छेदक होगा आलोकेतराऽसहकृतचक्षु
SR No.090487
Book TitleSyadvadarahasya Part 2
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages370
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size17 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy