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________________ स्क्वामृतम् आत्मा स्वभाव की अपेक्षा से स्फटिकमणि के समान सर्वदा शुद्ध है । यद्यपि कर्मबन्ध की अपेक्षा से आत्मा में अशुद्धता है परन्तु वह अशुद्धता पर के निमित्त से उत्पन्न हुई है । आत्मा उसे नष्ट करके सदा-सदा के लिए शुद्ध हो सकता है। इसलिए आत्मा शुद्ध है । स निर्लेपः कथं सौख्यस्मारक्रोधादिकारणात् । देह एवादि हेतुभ्यः कर्त्ता भोक्ता च नेश्वरः ||५|| अर्थ : वह आत्मा सौख्य, वासना और क्रोधादि कारणों से निर्लेप कैसे हो सकता है ? देहादि हेतुओं के कारण ईश्वर कर्त्ता और भोक्ता नहीं है । विशेषार्थ : योगमतानुयायी आत्मा को निर्लेप मानते हैं । आचार्यदेव उनसे प्रश्न करते हैं कि जिसमें सौख्य, वासना और क्रोध आदि का सद्भाव पाया जाता है, वह निर्लेप कैसे हो सकता है ? देहादि को ईश्वर का कर्तृत्व मानकर ईश्वर को कर्त्ता और भोक्ता मानना भी उचित नहीं है । ईश्वराभावतस्तस्मिन्, न तव्दत्वं प्रसिद्ध्यति । साधनासम्भवात् सोऽपि ब्रूते योगमतिष्टिकृत् ||६|| } अर्थ : योगमतावलम्बी कहता है कि ईश्वर का अभाव मानने पर देहादि की उत्पत्ति असंभव है, क्योंकि साधन के अभाव में साध्य का भी अभाव हो जाता है । विशेषार्थ : अनन्तरपूर्व कारिका में ग्रन्यकर्त्ता ने कहा था कि ईश्वर को देहार्दिक का कर्त्ता नहीं मानना चाहिये । इस कथन को सुनकर
SR No.090486
Book TitleSwatantravachanamrutam
Original Sutra AuthorKanaksen Acharya
AuthorSuvidhisagar Maharaj
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2003
Total Pages84
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size2 MB
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