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________________ Au anJMRSA -wesomस्मात जागृता-momme से उपस्थित किया गया है कि लोक में अस्त्यात्मा चेतनो द्रष्टा, पृथ्व्यादेरनन्वयात् । पिशाचदर्शनादिभ्योऽनादि शुद्धः सनातनः ॥४।। अर्थ : जारमा चेतन, जन्टा, पक्षी आदि के शिला (पंचमहाभूतों से। हित), पिशाचादि (चार्वाक आदि अन्य) मतों में प्रकट किये गये। ( स्वरूप से भिन्न, अनादि, शुद्ध और सनातन है 1 विशेषार्थ : __ अनन्तरपूर्व कारिका में चार्वाक भतवादी ने अपने पक्ष को। र प्रस्तुत किया था । अब करुणाधारी आचार्यदेव आत्मा के स्वरूप को। समझाते हुए इस कारिका की रचना कर रहे हैं । आचार्यदेव समझाते हैं कि आत्मा चेतन, द्रष्टा, पृथ्वी आदि से भिन्न , पिशाचादि मतों में प्रकट किये गये स्वरूप से भिन्न, अनादि, शुद्ध और सनातन है । आत्मा में ज्ञान और दर्शन नामक गुण हैं । उन गुणों के कारण आत्मा स्वयं स्वभाव से ही चेतन है । है आत्मा में तीन लोक के समस्त पदार्थो को देखने की शक्ति है । इसलिए आत्मा द्रष्टा है । है चार्वाक मत में वर्णित पाँच महाभूतों से आत्मा के उत्पत्ति की ! । कल्पना अनुचित है, क्योंकि उपादान कारण के समान ही कार्य होता। है । पाँच महाभूतों में ईरण, द्रव, उष्णता आदि मूर्त धर्म पाये जाते है हैं । वे धर्म जीव में भी पाये जाने चाहिये परन्तु ऐसा है नहीं । अग्नि पर रखी हुई हण्डी में उड़द पकाया जा रहा है । । उससमय उस स्थान पर पाँ) भूतों की उपस्थिति है परन्तु वहाँ जीव । नहीं है । इससे भी सिद्ध होता है कि जीव की उत्पत्ति पाँच महाभूतों। से नहीं होती है । प्रत्येक द्रव्य नित्य होता है । न उनका उत्पाद होता है और न व्यय होता है । अतः आत्मा अनादि और सनातन है ।
SR No.090486
Book TitleSwatantravachanamrutam
Original Sutra AuthorKanaksen Acharya
AuthorSuvidhisagar Maharaj
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2003
Total Pages84
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size2 MB
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