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________________ सूक्तिमुक्तावली C अर्थ-जैसे रत्नोंकी उत्पत्ति का स्थान पर्यंत होता है, ताराओं का स्थान आकाश होता है, कल्पवृक्षों का स्थान स्वर्ग होता है, कमलोंको उत्पत्तिका स्थान सरोवर [ तालाब ] होता है, और अगाध जल का स्थान समुद्र होता है उसी प्रकार भगवान जिनेन्द्र देवकी आज्ञानुसार चलने वाला मुनि आर्यिका श्रावक श्राविकाओं का संघ चन्द्रमा के समान निर्मल गुणोंका स्थान होता है ऐसा विचार कर उसकी [ संघकी ] पूजा- सरकार करना चाहिये । शार्दूलविक ३२ यः संसारनिरासलालसमतिर्मुक्त्यर्थमुत्तिष्ठते सेदी व नेवास्ताः समः | यस्मै स्वर्गपतिर्नमस्यति सतांयस्माच्छुभं जायते स्फूर्तिर्यस्य परा वसंत च गुणायस्मिन्स संवत ||२२|| । व्याख्या--- भो भव्याः भवद्भिः स श्रीचतुर्विधसंघः अतां पूज्यतां खः कः यः संव: संसार निरासलालसमतिः सन् संसारस्य निरासे निराकरणे त्यागे लाळसा इच्छा यस्याः सा ईदृशीमतिबुद्धिर्यस्य सः ईदृशः सन् मुक्त्यर्थी मुक्तिसाधनार्थ उत्तिष्ठते सावधानो भवति । पुनः यं संघ पावनतया पवित्रत्वेन दौर्थभूतं कथयंति । पुनः येन सधेन समः सदृशोऽन्यः कोपि नास्ति । पुनर्यस्मै संघाय स्वर्गपति देवपति इन्द्रः स्वयं नमस्यति नमस्कारं करोति । पुनर्यस्मात् संघात् सतां सज्जनानां शुभं कल्याणं आयते यत्पद्यते । पुनर्चश्य संघस्य स्फूर्तिर्महिमा परा उत्कृष्टा वर्तते । पुनर्यस्मिन् संघे गुणा गांभीर्य्यं १ देवपत्ति नर्मस्यति इति पाठान्तरम् ।
SR No.090482
Book TitleSuktimuktavali
Original Sutra AuthorSomprabhacharya
AuthorAjitsagarsuri
PublisherShanti Vir Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages155
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
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