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________________ 병점 ॥ ४१ ॥ THANKS गृहीत्वा ततो मुंधाम्यहं स्वकम् ॥२७॥ रेरे अात्मन् हृबोकार्थे दुःखदेऽतिविनश्वरे । रविं कृत्वात्र मूढस्त्वं प्राप्तः दुःख| परंपराम् ||२८| गृहीत्वा जिनधर्मं हि बुध्यात्मनं त्यजाम्यहम् | पंचादविषयं सर्वं ध्यात्वा जैनेन्द्रदीर्थपम् ||२६|| भोगाः पंचेन्द्रियोद्भूता दारुणा दुःखदा हहा | अद्यावधि मया मुक्ता रतिं कृत्वा विमोहवः ||३०|| तेभ्यो सुचामि स्वात्मानमधुना जिनमार्गतः । जिनदोक्षां गृहीत्वा चारित्रं च चराम्यहम् ||३१|| निजात्मानं विमुंचामि दुष्टाष्टकर्मशत्रुतः । तीव्रक्लेशकः शत्रुर्न ज्ञातो मोहभावतः ||३२|| हा हायावधि पर्यन्तमनादिकालतो मया । वृथैव गमितः कालो विपयालुग्धचेतसा ||३३|| सज्जातौ सत्कुले जन्म लकवा जैनागमं तथा । तथापि गमितः कालः वृथैव विषये मया ||२४|| | भवक्लेशोद्भवं दुःखं न ज्ञातं सहता मया । हा हा चात्महितं तत्त्वं नाधीतं स्वर्गमोक्षदम् ||३४|| भवान्मुचाम्यहं सः ही दुःख देती है इसलिये मैं जिनधर्मको धारणकर इस संसारसे कम अपने आत्माको अलग करूंगा ||२७|| हे आत्मन् ! तूने अज्ञानता धारणकर दुःख देनेवाले और नष्ट होनेवाले इन इंद्रियों विषयोंमें राग उत्पन्न किया | इसीलिये तूने अनेक दुःखोंकी परंपरा प्राप्त की ||२८|| अब मैं जिनधर्मको धारणकर आत्माका स्वरूप समझकर और भगवान् जिनेन्द्रदेवका ध्यानकर पांचों इन्द्रियोंके विषयोंका सर्वथा त्याग करूँगा ||२९|| ये पांचों इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए भोग बड़े ही दारुण हैं और बहुत ही दुःख देनेवाले हैं। मोहके कारण मैंने आजतक उनमें प्रेम किया और उनका उपभोग किया ||३०|| अब मैं उन भोगोंसे अपने आत्माको अलग करना चाहता हूँ और जिनमार्गको धारणकर तथा जिनदीक्षाको स्वीकारकर सम्यक् चारित्रका पालन करना चाहता हूँ ||३१|| अब मैं इन आठों कर्मरूपी दृष्ट शत्रुओंसे अपने आत्माको छुड़ाना चाहता हूँ। मैंने अपने तीव्र मोहके कारण तीव दुःख देनेवाले इन कर्मरूप शत्रुओंको आजतक नहीं जाना ॥ ३२॥ हा हा, मैंने अपने चित्तको विषय में आसक्त कराकर अनादि कालसे आजतक व्यर्थ ही कालक्षेप किया ||३३|| मैंने श्रेष्ठ जातिमें तथा सत्कुलमें जन्म लिया और जिनागमका रहस्य जाना, तथापि मैंने विषयोंमें व्यर्थ ही काल गमाथा ॥ ३४ ॥ संसारसे उत्पन्न हुए अनेक दुःख मैंने सहे, तथापि मैंने उनको जाना नहीं । हाय, स्वर्ण मोक्ष देनेवाले और आत्माका हित करनेवाले तत्रोंका अध्ययन भी मैंने नहीं किया ||३५|| अब में इस जिनधर्म के प्रभाव से जिन ००६ ur
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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