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________________ .. १९६॥ सिद्धये ॥६॥ परं समयसारस्य मूर्ति कृत्वा सुभावतः । संस्थाप्य हृदये तो ये प्रारूप विचिन्तयेत् ॥६२॥ कायोत्सर्गेम संस्थाय कायोत्सर्गमयी कृतिम् । मत्वा नि:संगमरमानमहन्त चिन्तयेजिनम् ॥शा ध्यानकाले सदैवात्र कायोत्सर्ग जिनाकृतिम् । श्रेष्ठा सुध्यानगम्या या चाहंद्र पप्रकाशिका ॥६४।। पूजयेद्राषयेद्भक्त्या स्मरेप चिन्तयेबपेन् । ध्यायेनमे | बा स्तूयात् कायोत्सर्गजिनाकृतिम् ।।६।। अनारतं ततो ध्यायेत संस्थाप्य हदि मन्दिरे । जिनबिम्ब महामन्या श्रद्धाभरे वा ॥६॥ इत्यभ्यासबलेनात्र जिनबिम्बस्य चित्तनम् । स्थिरं कृत्या मनस्तेन शनैरवन्मयतां व्रजेत ॥६॥ अन्तरंटया निजं चित्तं संलीय च निजात्मनि । गूढ़ संस्थाप्य चास्मानं ध्यायेत्तव जिनाऋतिम् ।।६। येन येन सुभायेन चान्त या निमील्य च । स्त्रात्मानं स्वात्मनि तेन सद्र पस्थं जिनं भजेत् ॥६॥ परमात्मा स एवाई सोऽहंसोऽहं प्रपद्य के आत्माकी सिद्धि के लिये ध्यान करना चाहिये ।।६१॥ अपने निर्मल परिणामोंसे समयसाररूप शुद्ध आत्माकी | भूर्ति बनाकर और उसको अपने हृदयमें स्थापनकर उस ब्रह्म-स्वरूप मूर्तिका ध्यान करना चाहिये ॥१२॥ | कायोत्सर्गसे खड़े होकर अपने आत्माफी मुर्तिको कायोत्सर्गरूप कल्पना करनी चाहिये और अपने आत्मामें समस्त परिग्रहसे रहित अरहंतकी कल्पनाकर अपने आत्माको अरइतरूप चितवन करना चाहिये ॥६३|| ध्यानके समयमें भगवान् अरहंतदेवके रूपको प्रकाशित करनेवाली कायोत्सर्ग प्रतिमा श्रेष्ठ और ध्यानके योग्य मानी गई है। इसलिये कायोत्सर्ग जिन-प्रतिमाकी भक्तिपूर्वक सदा पूजा करनी चाहिये, भावना करनी चाहिये, उसका स्मरण करना चाहिये, जप करना चाहिये, चितवन करना चाहिये, उसको नमस्कार करना | चाहिये और उसकी स्तुति करनी चाहिये ॥६४-६५|| मगवान् जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाको अपने हृदयमन्दिरमें स्थापनकर अत्यन्त भक्तिसे तथा दृढ़ श्रद्धापूर्वक उसका निरंतर ध्यान करना चाहिये ॥६६॥ इसप्रकार ध्यानका अभ्यासकर और मनको अत्यन्त स्थिरकर जिनप्रतिमाका चिन्तवन करना चाहिये और | फिर चितवन करते हुए तन्मय हो जाना चाहिये ॥६७॥ अपने चित्तको अंतष्टिसे अपने आस्मामें लीन कर | लेना चाहिये और जिनेन्द्रदेवकी आकृतिके समान अपने आत्माको गृह स्थापनकर उसका चिन्तवन करना all चाहिये ॥६८॥ यह आत्मा जिन २ परिणामों से अपने आत्माको अपने आत्मामें अंतर्दृष्टिसे लीन कर लेता Fel है, उन्हीं परिणामोंसे वह आत्मरूप भगवान जिनेन्द्रदेवका ध्यान करता है ।।६९॥ "जो परमात्मा है वही मैं हूँ,
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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