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________________ ० प्र० ॥ १५१ ॥ रुणम् । तस्मात्स्यान्मे कथं शीघ्रमुद्धारः खलु सौख्यदः ||१६|| मामुद्धृत्य हि तस्माद्वा कोऽसौ निष्कासयत्यपि । लोके हि श्रूयते यत्र तस्मानिष्कासने पटुः ॥४७॥ एको हि जिनधर्मोऽस्ति स माह्मो हि मयाऽधुना । इति चिन्तापरत्वेन चैकाग्रेण च चिन्तनम् ||१८|| भवदुःखाद्भवापायस्य चिन्तनविचारणे । तदपायाभिर्थं ध्यानं भवदुःखविनाशकम् ||१६|| व्यसनानि कदा रुन्धे नानादुःखकरारि च । कथं केन प्रकारेण तदपायस्य चिन्तनम् || ६ || त्रिलोकजयिनां कामं कथं जेष्यामि साम्प्रतम् । कथं वा मोहराजं तं जेष्यामि भवदायकम् ||६|| तदर्थंमत्र चैका प्रचिन्तासंरोधपूर्वकम् । चिन्तनं मननं ध्यानं तदुपायाभिधं मतम् ||६२|| कर्मास्रव निरोधो मे कथं स्यात्सौख्यदायकः । स्वचित्तेऽत्र तदर्थं हि स्थापयामि कथं पुनः ॥ ६३॥ गुप्तिसमितिचारित्रधर्मादीन् वा शिवात्मकान् । इति चिन्तापरत्वेन चैकाग्रमनसा स्वयम् ॥६४॥ चिन्तनं मननं चित्ते भूयो भूयो विचारणम् । अपायविचयं ध्यानं कर्मास्त्रत्रनिरोधकम् || ६५|| देहात्मको हि दृश्येऽहं यद्यपि कर्मतः । तथाtयहूं जो नैव नैत्रयास्मि विचेतनः ||६६ || मयि वा मत्स्वरूपोऽहं मद्गुणेन हगादिना । नान्पोई मुझे कौन बाहर निकालेगा १ लोक में सुना जाता है कि उस संसाररूपी गढ़ेसे निकालने में एक जैनधर्म ही चतुर है। इसलिये अब मुझे उसी जैनधर्मको धारण करना चाहिये। इस प्रकारके चितवन पूर्वक एकाग्र मनसे संमारके दुःखोंसे उत्पन्न होनेवाले अपाय वा नाशका चितवन करना, उसका मनन करना संसारके समस्त दुःखों को नाश करनेवाला अपायविar नामका धर्मध्यान कहलाता है ॥५५-५९|| अनेक प्रकारके दुःख देनेवाले इन व्यसनों को मैं कब और किसप्रकार रोकूंगा ? इसप्रकार व्यसनों के नाशका चिन्तत्रत्र करना अथवा तीनों लोकों को जीतनेवाले इस काम को अब मैं कैसे जीतूंगा ? अथवा संसारको बढ़ानेवाले इस मोहराजको मैं कैसे जीतूंगा ? इसप्रकार अन्य सब चिंताओंको रोककर एकाग्रमनसे चितवन वा मनन करना अपायविचय नामका धर्मध्यान कहलाता है ||६० - ६२|| समस्त सुखोंको देनेवाला, कर्मों के आस्रव निरोधकरूप संवर किस प्रकार होगा ? और उस संपरके लिये मैं अपने हृदयमें गुप्ति, समिति, चारित्र और धर्म आदि कल्याण करने वालोंको किमप्रकार धारण करूंगा ? इसप्रकारके चितवन पूर्वक एकाग्र मनसे अपने मनमें विचार करना, मनन करना और बार बार चितवन करना कम के आसवको रोकनेवाला अपायविचय नामका धर्मध्यान कहलाता है ।।६३-६५ ।। यद्यपि मैं कर्मकारण शरीररूप दिखाई देता हूं, दथापि न तो मैं जड़ हूं और न अचेतन हूं। मैं सम्यग्द માર १५
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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