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________________ सिद्धान्तसार दीपक हैं । इस प्रकार छह राजू में सोलह स्वर्ग स्थित हैं। इनके ऊपर एक राजू में नौ वेयक, नव अनुदिश, पाच अनुत्तर और सिद्ध शिला अवस्थित है । इस प्रकार मेरु तल से ऊर्ध्वलोक के सात राजू क्षेत्र में स्वर्गादिक हैं॥१८-२०॥ यथा -- -- पी - na-pueing-in-AN बाग 1 r- अब पटलों का प्रमाण कहते हैं: श्राद्ये स्वर्युगले चैक विशस्युः पटलाग्यपि । द्वितीये तानि सप्तव चत्वारि तृतीये ततः ॥२१॥ चतुर्थे युगले द्वे स्तः पटले पञ्चमे भवेत् । पटल के युगे षष्ठे हय के सत्पटलं मतम् ॥२२॥ सप्तमे युगले त्रोण्यष्टमे त्रिपटलान्यपि । प्रोण्येव पटलानि स्पुरधो बेयकत्रये ॥२३।। सन्ति त्रिपटलान्येव मध्यग्रं देयकत्रये । ततस्त्रिपटलानि स्युरुर्ध्वग्न वेयकत्रिके ॥२४॥ नवानुदिशसन स्यात्पटलकं ततः परम् । पञ्चानुत्तरनामैकं पटलं चेति तान्यपि ॥२५॥ पिण्डीकृतानि सर्वाणि त्रिषष्टि पटलानि वै । स्युरुपर्युपरिस्थानि कम्पकल्पातिगानि च ॥२६॥
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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