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________________ ४५६ सिद्धान्तसार दीपक का इन्द्र चन्द्रमा है, इसके परिवार में प्रतीन्द्र, सामानिक, तनुरक्षक, पारिषद, मनीक, प्रकीर्णक प्राभिबोल और मिम्पिषिक प्यास के देव होते हैं। अढाई द्वीप में ज्योतिर्देवों का गमन पंक्ति पूर्वक होता है 11५६-६०॥ मानुषोत्तर पर्वत के आगे असंख्यात ज्योतिष्क देवों के समूह हैं, जो निरन्तर अचल ही रहने हैं, अर्थात् कभी गमन नहीं करते ॥६१।। पब मनुष्यलोक को ध्रुव ताराओं का प्रमाण कहते हैं : जम्बूद्वीपे च षटत्रिशत्प्रमारणास्तारका ध्रधाः। लवणाधौ तथैको न चत्वारिंशद्युतं शतम् ॥६२॥ तारकाः धातकीखण्डे सहस्र दशसंयुतम् । कालोदेचेक चत्वारिंशत्सहस्त्रास्तथा शतम् ॥६३॥ विंशत्यध्रवाः सन्ति तारकाः पुष्करार्धके ।। त्रिपञ्चाशत् सहस्राणि त्रिंशदन शतद्वयम् ॥६४॥ ध्र वाः स्युस्तारका एषां चलनं जातु नास्त्यपि । तिर्यग्लोके समस्ताश्च ध्र वाज्योतिष्कनिर्जराः ॥६५॥ अर्थ:-जम्बूद्वीप में ३६ ध्रुव ताराएँ हैं । लवण समुद्र में १३६ धातकी खण्ड में १.१०, कालोदधि के ऊपर ४११२० और पुष्कराध के ऊपर ५३२३० ध्रुवताराएँ हैं ।।६२-६४।। इसप्रकार अढाई द्वीप में ( ३६ + १३६ + १०१० + ४११२० + ५३२३०= ) ९५५३५ ध्रुवताराएँ हैं, ये कभी भी चलायमान नहीं होती। अर्थात् गमन नहीं करतीं । तिर्यग्लोक में अर्थात् अढ़ाई द्वीप से बाहर के सभी ज्योतिर्देव ध्रुव हैं । अर्थात् कभी गमन नहीं करते ।।६५।। अब मेरु से ज्योतिष्क देवों की दूरी का प्रमाण, उनके गमन का क्रम और एक सूर्य से दूसरे सूर्य का एवं सूर्य से बेदी के अन्तर का प्रमाण कहते हैं :-- एकः विशाधिककादश शर्योजनश्च खे । तिर्यग्मेरु विहार्यते परिभ्रमन्ति सर्वतः ।।६६।। सर्वज्योतिष्कवृन्दार्धाः स्वस्वद्वोपाम्बुधि श्रिताः । ज्योतिष्का मर्त्यलोकस्यैकस्मिन् भागे चलन्ति च ॥६७।। अन्ये ज्योतिर्गणार्धा ज्योतिष्कामराभ्रमन्त्यपि । खे स्वस्वसद्विमानस्था भागेऽन्यस्मिनिरन्तरम् ॥१८॥
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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