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________________ दशमोऽधिकारः ३८५ तेषां मध्ये बसकटेषु चतस्रो वसन्ति ताः । . . या महत्तरिकारचाहमातकर्माणि कुर्वते ॥३७७॥ अमीषां सर्वकटानामन्तर्भाग भवन्ति च । चत्वारि मणिकूटानि चतुर्दिक्षु महान्त्यपि ।।३७८।। एतेषां मूनि राजन्से देवोत्थासर्बोत्सवोत्करैः। चैत्यालया जिनेन्द्राणां चत्वारो मणिभास्वराः ॥३७६॥ एषां समस्तकूटानामुदयां विस्तरो द्विधा । मलेग्ने च भवेत्कुण्डलस्थकूटः समानकाः ॥३०॥ अर्थ:-रुचक नाम के इस पर्णत के कार बहिर्भाग में पूर्ण, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर इन चारों दिशाओं में से पृथक पृथक् दिशा में पाठ आठ कुट हैं। अर्थात् कुल ३२ फूट हैं ॥३६६॥ पूर्व दिशागत पाठ कूटों में दिक्कुमारी देवियां रहती हैं, और ये जिनमाता के शृंगार आदि को क्रियाएँ करती हैं ।।३७०॥ दक्षिण दिशागत लटों के ऊपर स्थित प्रासादों में मरिणमय दर्पण धारण करने वाली आठ दिक्कुमारियां निवास करती हैं ॥३७१॥ पश्चिम दिशागत कष्टों के ऊपर स्थित प्रासादों में श्वेत छत्र धारण कर हर्षित मन से जिनमाता की सेवा करने वाली पाठ दिक्कुमारियाँ रहती हैं ॥३७२!! उत्तर दिशागत कूटों पर पाठ दिवकुमारियां रहती हैं, जो यहाँ जिनमाता के पास प्राकर चंवर ढोरती है ।। ३७३॥ तथा इसो पर्वत पर पूर्व प्रादि चारों दिशाओं में से पृथक् पृथक् दिशा में (पूर्वोक्त कूटों के अभ्यन्तर की ओर ) पंक्तिबद्ध प्रति मनोज्ञ तीन तीन कूट हैं ॥३७४॥ इनमें से चारों दिशाओं के चार कूटों ( एक एक कूट ) में चार दिक्कुमारियां रहती हैं. जो जिनमाता के निकट पाकर हर्षोल्लास पूर्वक सेवा करती हैं ॥३७५।। उपर्युक्त तोन तीन बूटों के मध्य में स्थित चारों दिशामों के चार कुटों पर जो प्रासाद हैं, उनमें अति निपुण महत्तरिका दिक्कुमारियां निवास करती हैं ।।३७६।। उन मध्य स्थित चार कूटों में जो चार महत्तंरिका निवास करती हैं, वे तीर्थकर के जन्म समय में जात कर्म करती हैं ।। ३७७।। इन सर्व कूटों के अभवन्तर की भोर चारों दिशाओं में जो रत्नमय चार महान कुट हैं, उनके शिखर पर देवों द्वारा किये हुए महान उत्सवों से युक्त और मणियों को प्रभा सदृश भास्वर जिनेन्द्र भगवान के चार फूट शोभायमान होते हैं ॥३७६॥ इन समस्त ( ३२+१२= ४४ ) कूटों की ऊँचाई तथा मूल और शिखर भाग के विस्तार का प्रमाण कुण्डलगिरि स्थित कुटों के समान है। अर्थात् इन समस्त कूटों का मूल विस्तार ५०० योजन, शिखर विस्तार २५० योजन और उस्सेध भी ५०० योजन प्रमाण है ।।३८०।। ( रुचकगिरि के क्लटों आदि का चित्रण अगले पृष्ठ पर देखें।)
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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