SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 416
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३७० ] सिद्धान्तसार दीपक व्रत, शौल, तप और सम्यग्दर्शन से विभूषित यहाँ की प्रजा हमेशा अत्यन्त शुभ जिनधर्म में हो र रहती है | यहाँ ब्राह्मण वर्ण कहीं भी नहीं हैं ।। २६६ ।। यहां स्वप्न में भी कहीं पांच प्रकार का मिथ्यात्व दिखाई नहीं देता । न यहां मिध्यात्व का उपदेश देने वाले उपदेशक ही होते हैं, और न कोई मतान्तर ही हैं, किन्तु पुण्यवान जीवों के तप, दान, व्रत, पूजा और अनेक श्रामिक उत्सवों के द्वारा प्रत्येक गृहों में मात्र एक जंनधर्म ही देखा जाता है ।।२६७-२६८ ।। इस प्रकार के श्रेष्ठ देशों के उत्तम कुलों में स्वर्ग और मोक्ष रूप उत्तम गतियों की प्राप्ति के लिए पूर्वोपार्जित पुण्य से युक्त भव्य जीव ही जन्म लेते हैं, अन्य अर्थात् क्षीण पुण्य वाले नहीं ||२६|| अब मानुषोत्तर पर्वत का सविस्तर वर्णन करते हैं ——— यास्य पुष्करार्धस्य मध्यभागे विराजते । शैलोऽई स्यहार्यः स श्रीमान्मानुषोत्तरः || २७० ॥ चतुर्दशनदीनिर्गमन द्वारादिशालिनः । क्रमह्रस्वस्य चास्याद्ररुदयो योजनंर्मतः ॥ २७१ ॥ एकविंशतिसंयुक्तसमा प्रदशभिः शतैः । भूतले विस्तरो द्वाविंशतियुक्तसहस्रकः ।। २७२ ।। मध्ये व्यासस्त्रयोविंशत्य ग्रसतशतप्रभः । मूर्ध्नि व्यासश्चतुविशाग्र चतुःशतमानकः ॥ २७३ ॥ अवगाहो क्यूत्प्रत्रिशच्चतुःशतप्रमः । श्रीशोषता दिव्यादोप्रास्ति मणिवेदिका || २७४ || नैऋत्यवायुदग्भाग मुक्त्वा षदिविदिक्षु च । स्युस्त्रीणि त्रीणि कूटानि श्रेण्याः पृथग्विधान्यपि ।। २७५ || अग्नीशानदिशोः षट्सु कटेषु दिव्यधामसु । गरुडादिकुमाराश्च मूत्या वसन्ति निर्जराः ।। २७६॥ शेषद्वादशकूटेषु चतुर्दिक्षूच्चसा । वसन्ति दिवकुमार्योऽस्य सुपर्णकुलसम्भवाः || २७७।। तथाष्टदशकूटानां तेषामभ्यन्तरेऽस्य च । चत्वारि सन्ति कूटानि पूर्वादिदिचतुष्टये ||२७८ ।। एषां चतुःसुकूटानां मूनि सन्ति जिनालयाः । स्वर्णरत्नमयास्तुङ्गाश्चत्वारः सुरपूजिताः ॥२७६॥
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy