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________________ २४४ ] सिद्धान्तसार दीपक देवों के गृह हैं । किल्विष देवों, आभियोग, सम्मोह और कन्दर्प जाति के देवों में से प्रत्येक के पृथक् । पृथक् शाश्वत और शोभायुक्त प्रासाद हैं ॥४४-४६।। प्रब अन्य देवारण्य का विस्तार करते हैं : ततः सीतामहानद्या-भागेऽस्ति दक्षिणे परम् । देवारण्यं च पूर्वोक्त म्यासाचस्तत्समं महत् ।।४७।। बनेऽस्मिन् सन्ति देवानां बहूनि नगराणि च । प्राकारगोपुराश्च तुङ्गधामजिनालयः ।।४।। अलंकृतानि वापीभिनंगरेषु सुरोत्तमाः । भूपाश्चतुर्महादेवीयुक्ता वसन्ति पुण्यतः ॥४६॥ परिषत् त्रितयैः सप्तसप्तानीकैः पृथग्विधः । सामान्यकात्मरक्षाचैर्वेष्टिताजिनभाक्तिकाः ।।५।। अर्थः–सीता महानदी के दक्षिण भाग में एक दूसरा देवारण्य नाम का दन है जिसके व्यास प्रादि का प्रमाण पूर्वोक्त देवारण्य के सदृश हो है ॥४७।। इस वन में भी देवों के बहुत से नगर हैं। प्राकार, गोपुर प्रादि, उत्तप्रासाद, जिनालय श्रीर वापी ग्रादि से प्रलंकृत इन नगरों में पूर्व पुण्य प्रताप से इन्द्र उत्तम देवों एवं चार महादेवियों से युक्त निवास करते हैं ।।४८-४६॥ तथा तीन प्रकार के पारिषद देवों. पृथक पृथक् सात सात अनोकों, सामानिक देवों और प्रात्मरक्षक आदि देवों से वेष्टित होकर जिनेन्द्र भगवान की भक्ति करते हैं ।। ५०।। प्रब देवारण्य के बाद अन्य वेदो, देश, वक्षार एवं विभङ्गा प्रादि को अवस्थिति का वर्णन करते हैं : ततः पश्चिमदिग्भागे दिन्यास्ति बनवेदिका । कोशानावगाहा च प्रागुक्तोत्सेधविस्तृता ॥५१॥ वेद्याश्च पश्चिमाशायां वत्साख्यो विषयो महान् । गंगासिन्धुनवीरूप्यातिभिः षट्खण्डसंयुतः ॥५२।। तदार्यखण्डमध्ये स्यात् सुसीमानगरी परा। धर्मसीमाकरीभूता यतिश्रावकधामिकः ।।५३॥ सप्तो भवेत् त्रिकुटाल्पो वक्षारशैल अजितः । चतुःकूटयु तोधिन घेत्यदेशलयाङ्कितः ।।५४।।
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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