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________________ सप्तमोऽधिकारः [२०६ द्वारा विभाजित किया गया पश्चिम विदेह दक्षिण विदेह और उत्तर विदेह के भेद से दो प्रकार का है ।।६७-६८॥ सीतानदी के उत्तर में, नीलकुलाचल के दक्षिण में और उत्तर कुरु भोगभूमि के पूर्व में उत्तर-पूर्ण विदेह क्षेत्र है ।।६६ अब भन्नशाल आदि की वेदियों का प्रमाण कहते हैं :-- मस्यादौ भद्रशालस्य रत्नवेदी क्षयातिगा। शतपंचधनुर्यासाद्विक्रोशप्रोन्नता भवेत् ॥१००। योजनानां सहस्राणि शतपंचाग्रषोडश । तथा द्विनवतिर्भागौ द्वौ कृतकोनविंशतः ॥१०१।। इत्यायामोऽस्ति वेद्याश्च तथान्या वनवेदिकाः । सप्तधास्याः समाना विशेयादी?च्चविस्तरः ॥१०२॥ अर्थ:-इस उत्तर-पूर्व विदेह क्षेत्र के प्रारम्भ में भद्रशाल वन की लय से रहित रत्नमय वेदी है। यह वन वेदो दो कोस ऊंचो, पाँच सौ धनुष चौड़ी और १६५६२१ योजन लम्बी है । इसी प्रकार अन्य सात (३ वेदिकाएँ भद्रशाल को, २ देवारण्य और २ भूतारण्य को =७) वन वेदिकाओं की दीर्घता एवं विस्तार आदि का प्रमाण जानना चाहिये । अर्थात् आठों वन वेदिकाएँ दो कोस ऊँचो, ५०० धनुष चौड़ी और १६५९२१ योजन लम्बी हैं ॥१००-१०।। अब विवेहस्य कच्छा देश की अवस्थिति एवं उसका प्रमाण कहते हैं :-- ततोऽस्याः पूर्वदिग्भागे दक्षिणे नीलशैलतः । सीताया उत्तरे कच्छाख्यः स्याद् विषय ऊजितः ॥१०३॥ योजनानां सहस्र द्वे द्वादशानशतद्वयम् । सार्धक्रोशत्रयं चेति च्यासोऽस्य पूर्वपश्चिमे ।।१०४॥ पायामो वेदिकातुल्यो दक्षिणोत्तरभागयोः । विदेहविस्तृतेः सीताच्यासोनस्यार्धसम्मितः ॥१०॥ अर्थ:- इस भद्रशालवन वेदी के पूर्व में, नौलकुलाचल के दक्षिण में और सीता सरित् के उत्तर में कच्छा नाम का एक महान देश है । इस देश की पूर्व-पश्चिम चौड़ाई दो हजार दो सौ बारह योजन { २२१२ योजन ) और ३३ कोश है, तथा दक्षिणोत्तर लम्बाई वेदिका की लम्बाई प्रमाण अर्थात् १६५६२0 योजन है ! विदेह के विस्तार में सीतानदी का व्यास घटा कर प्राधा करने पर कच्छा देश के पायाम का प्रमाण प्राप्त हो जाता है । यथाः-विदह का विस्तार ३३६८४, योजन और सीता
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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