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________________ २०. ] सिद्धान्तसार दीपक अस्य व्यासेन परिवारवर्णनोच्यते : जम्बूवृक्षस्यास्याग्नेय दिग्भागे अन्तः परिषद्देवानां द्वाविंशत्सहस्र गेहाधारपादपाः स्युः। दक्षिणा. शायां मध्यपरिषत् मुराणां चत्वारिंगत्सहस्रालयवृक्षाश्च । नैऋत्यकोरणे बाह्यपरिषद्गीर्वाणानां अष्टचत्वारिंशत्सहस्रग्रहजम्बूद्रमाः सन्ति। बायु दिगोशान दिशोः सामान्य कामराणां चतुःसहस्रगृहशाखिनो भवन्ति । पश्चिम दिशि सप्तानीक सुरागां सा गृहद् माश्च । चतुर्दिक्षु अङ्गरक्षारणां षोडशसहस्रसौधपादपाश्च । अष्टदिक्षु प्रतोहारोत्तमानामष्टोत्तरशतगेहाधारवृक्षा: सन्ति । चतुदिक्षु अनावृतदेवस्य चतुरप्रदेवीनां चत्वारः सौधान्वितपादपा भवेयुः। एते सर्ने पिण्डोकृताः प्रासादाङ्कितजम्बूवृक्षाः मूलजम्बूवृक्षेण समं एकलक्षचत्वारिंशत्सहस्र कशतविंशतिप्रमाणाः भवन्ति । ___ अर्थ :--प्रधान जम्बूवृक्ष की माग्नेय दिशा में अन्तः पारिषद देवों के बतीस हजार गृहों के प्राधार भूत जम्बनक्ष हैं। दक्षिगा दिशा में परिषद देतों के चालोस हजार गृह जम्बूवृक्ष हैं। नैऋत्य दिशा में बाह्यपरिषद देवों के अड़तालीस हजार प्रासादजम्वूवृक्ष हैं। वायव्य और ईशान दिशा में सामानिक देवों के चार हजार गृवृक्ष हैं । पश्चिम दिशा में सात अनीक देवों के सात गृहद्र म हैं। चारों दिशाओं में अङ्गरक्षक देवों के सोलह हजार सौववृक्ष हैं । दारों दिशानों और चारों विदिशानों में प्रतीहार देवों के उत्तम एक सौ पाठ गृहों के आधार भूत वृक्ष हैं। चारों दिशाओं में अनाय त देव की चार पट्टदेवाङ्गनामों के भवनों से समन्वित चार व क्ष हैं । प्रधान जम्बूब क्ष के साथ इन सब प्रासाद युक्त जम्बूव क्षों को एकत्रित करने पर - (१३२०००+४०००० + ४८०००+ ४०००+७+१६००० +१०८+-४) = १४०१२० अर्थात् एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस प्रमाण होते हैं। अब शाल्मलिवृक्ष का वर्णन चार श्लोकों द्वारा करते हैं:--- मेरो ऋत्यदिग्भागे सोतोदापश्चिमे तटे । निषधाद्रिसमीपेऽस्ति देवादिकुरुभूतले ॥५१॥ उत्सेधायामविस्तारर्जम्बूवृक्षसमो महान् । परिवार मैः सर्वैः शाल्मली वृक्ष जितः ।।५२॥ तस्य दक्षिणशाखायां रत्नशाली जिनालयः । वेणुदेवादिमिः पूज्यो जिनबिम्बभतो भवेत् ॥५३॥ शेषशाखात्रयाग्रस्थप्रासादेषु बसेत् सुरः । गरुडान्वयजो वेणुदेवो देवः समं महान ॥५४॥
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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