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________________ तीर्थकर महावीर की दिव्यध्वनि छियासठ दिन तक नहों खिरी.तन इन्द्र छात्र का वेश धारण करके गौतमग्राम की ब्राह्मणशाला में जाकर गौतम से पढ़ते समय उनसे जिस छन्द का अर्थ पृछता है वह इस दृष्टि से दृष्टव्य है पझपनवपदाकालपञ्चस्तिकाकानाना विदुषां वरः स एव हि यो जानाति प्रमाण नयः ॥५२ ।। इसके आगे और पूर्व के प्रसंग्त्र भी अत्यन्त सरल, सुबोध एवं थोड़े शब्दों में अधिक भावों की अभिव्यंजना की क्षमता रखते हैं। उनके पास अपने सीमित साधनों से जितना और जिस कप में बन सका, उन्होंने दिगम्बर परम्परा का इतिहास लिखा । यद्यपि अन्य ग्रन्थों में भी हमारी आचार्य परम्परा के उल्लेख मिलते हैं किन्तु अनेक दृष्टियों से इस श्रुतावतार का बहुत पहत्त्व है। श्रुत शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ करते हुए आचार्य पूठ्यपाट ने कहा है 'ततावरणकर्ग क्षयोपशमे सति निरूपयामाणा श्रूयते अनेन श्रवणमात्रं वा श्रुतम् (सर्वार्थसिद्धि १.६.) तथ:केवलिभिापदिष्ट बुद्धयतिशयद्धियुक्ताणधरानुस्मृतं ग्रन्धरचनं श्रुतं भवति' (सर्वार्थसिद्धि ६.१३) अर्थात् श्रुतज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम होने पर निरुप्यामाण जिसके द्वारा सुना जाता है, जो सुनता है या सुनना मान श्रुत' कहलाता है तथा वली द्वारा उपविष्ट और अतिशय बुद्धि-ऋद्दियुक्त गणधरदेव, उनके उपदेशों का स्मरण करके जो प्रन्थों की रचना करते हैं वह 'श्रुत' कहलाता है आचार्य अकलंकदेव के अनुसार, "श्रुत' शब्द कर्म साधन भी होता है। श्रुतज्ञानावरण कर्म क्षयोपशम आदि अंतरंग-बहिरंग कारणों के सन्निधान होने पर जो सुना जाय वह श्रुत' है। करीसाधन में श्रुत परिणत आत्मा ही सुनता है वह 'श्रुत' है। करण (भेद) विवक्षा में लिससे मुना जाता है वह 'श्रुत' है और भाव साधन में श्रवण क्रिमा धान को 'श्रुत कहते हैं। (तत्त्वार्थवार्तिक १.६.२.) इस तरह के श्रुत के अवतरण की परम्प और उसका बनान्न इन्द्रनंदि ने अपने इस ग्रन्थ में प्रतिपादित किया है। इसमें उन्होंने भरत क्षेत्र की स्थिति, सुषमा-सुपपादि काल के भेटों का विवेचन कुलकर व्यवस्था का क्रमशः प्रतिपादन करते हुए प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम एवं चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान महावीर तक की परम्परा और उनकी विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन किया है। तीर्थकर पहावीर और उनके घरों का विशेषकर गौतम गणधर का कुछ विस्तार से वृत्तान्त प्रस्तुत करते हुए उनके बाद की परम्परा का और वर्तमान में आंशिक रूप में उपलब्ध श्रुत (आगमज्ञान) के मूल का कालक्रमानुसार जो इतिहास प्रस्तुत किया है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। पध संख्या ७५ पें कहा है - गौतम गणधर, सुधर्माचार्य और जम्बूस्वामी अनुबन केवली की सम्पदा को प्राम थे। इनके मोक्ष चले जाने के बाद ही इस भरत क्षेत्र में केवलज्ञान रूप सूर्य अस्त हो गया। अर्थात् इनके बाद किसी को केवलज्ञान नहीं हुआ। जाम्बू-स्वामी के बाद विष्णु, नन्दिभिन्न, अपराजित, गोवर्धन और भट्टनाहु- ये पांच श्रुत केबली हुए । इसके बाद विशाखाचार्य, प्रोटिल. क्षत्रिय, जय, नाग, सिद्धार्थ, धृति, विजय, बुद्धिल, गंगदेव और धर्मसेन• ये ग्यारह आचार्य दशपूर्वधारी हुए । इनके बाद नक्षत्र, जयपाल, पाण्डु. ध्रुवसेन और कंस- ये पाँच एकादशांगधारी हुए तथा इनके बाद सुभध्र, अभयभद्र, जयबा और लोहार्य- ये चारों आचारांगधारी हुए । इनके बाद की भी बहाँ आचार्य परम्परा प्रस्तुत की गई है किन्तु षट्खण्डागम आदि ग्रन्थों एवं कुछ पावलियों में उपलब्ध परम्परा से कुछ नामों में यहाँ अन्तर सम्भवतः प्राकृत भाषा से संस्कृत श्रुतावतार
SR No.090472
Book TitleShrutavatar
Original Sutra AuthorIndranandi Acharya
AuthorVijaykumar Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size1 MB
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