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________________ भूमिका आचार्य इन्द्रनन्दि और उनका श्रुतावतार श्रीमद्-इन्द्रन्टिं आचार्य विरचित "श्रुतावतार" नामक प्रस्तुत गौरवशाली Fध श्रमण जैन परम्म्ग का महत्वपूर्ण उस्तावेज है। एकसौ सतासी संस्कृत पद्यों वाला यह ग्रन्थ जहाँ एक श्रेष्ठ काव्य है, नहीं प्राचीन भारतीय इतिहास की लेखन-परम्परा का एक आदर्श, दुर्लभ एवं बहुमूल्य अन्ध भी है। हमारे प्राचीन आचार्यों ने स्व-पर कल्याण एवं निरन्तर परम्परा जोवंत रखने के उद्देश्य से यद्यपि तत्वज्ञान-विज्ञान, यम: रोग, साहित्य, संगीत, पुराण, काय, गणित, कला, ब, व्याकरण एवं आयुर्वेद आदि सभी विषयों से संबंधित विपुल साहित्य चित्रण जिस तरह प्रस्तुत "ब्रुतावतार" ग्रन्थ में किया है, वैसे समार्ग भारतीय साहित्य में बहुत कम उपलब्ध हैं। वस्तुन. जैनधर्म-दर्शन, संस्कृति एवं साहित्य की समृद्धि और उसकी प्राचीन परम्परा को जी योगदान है, उसका अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर जो महत्व, गौरव एवं मूल्यांकन प्राप्त होना चाहिए वह कुट पक्षपातवश भी नहीं हो रहा है। उसके उचित प्रचार-प्रसार की दिशा में कमी के भानीदार, उस सम्पूर्ण विरासत के उत्तराधिकारी हम लोग भी कम नहीं हैं। किन्तु अब जैसे-जैसे भारतीय इतिहास, साहित्य, कला-संस्कृति, भाषा विज्ञान एवं पुरातात्विक साक्ष्यों आदि का अध्ययन हो रहा है वैसे-वैसे श्रमण संस्कृति की प्राचीनता एवं समृद्धि आदि का अध्ययन भी आगे बढ़ रहा है। जैनेतर विद्वान भी इसमें ज्यादा रुचि लेने लगे हैं। हमारे आन्पर्यों ने विविध विधाओं में साहित्य की रचना तो विपुल मात्रा में की किन्तु उन्होंने अपने एवं अपनी परम्परा के विषय में बहुत कम सूचनायें दी। वस्तुत: आत्म-श्लाघा से दूर रहकर स्व-पर कल्याण ही उनके जीवन एवं माहित्य सृजन का उद्देश्य था। इससे ज्यादा प्रमाण और क्या हो सकता है कि प्रस्तुत श्रुतावतार गन्ध में अचार्य इन्द्रनन्दि ने जैन परम्परा को बहुत ही सुन्दर इतिहास संजोया है किन्तु उन्होंने अपने नाम के अतिरिक्त स्वयं अपने विषय में अथवा अपनी परम्पग के विषय में कोई जानकारी नहीं दी। जैन साहित्य के इतिहास में इन्द्रनन्दि' नाम के लगभग पाँच आचार्यों का नामोल्लेख विभिन्न प्रसगो. विभिन्न ग्रन्धकाओं, परम्पराओं के समय का निधारण इस ग्रन्थ से ही हम कर सकते हैं। चूंकि इन्होंने आचार्य बीरसेन (हवीं शता) एवं जिनसेन । १०वीं शती) तक के ही आचार्यों और इनकी धवला, जयधनला टीकायें, जो कि क्रपश घरतण्डागम तथा कसायपाहुद्धसुत पर लिखी गई हैं, के ही विस्तृत परिचय अपने इस श्रुतावतार प्रन्थ में लिखे हैं। इनके बाद के आचार्य नेभिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवत (११वीं शती) आदि और उनकी रचनाओं का विवरण नहीं दिया। इससे सिद्ध होता है कि इन्द्रनन्दि १ञ्चौ शती के आचार्य हैं। इन्द्रनन्दि की यही एकमात्र कृति है। किन्तु इस एकमात्र उत्कृष्ट कृति से इतिहास-साहित्य को समृद्ध करके वे सदा के लिए अमर हो गये। इस कृति में उनकी विद्वत्ता, विविध शास्त्रों एवं उनके विषयों का तलस्पर्शी ज्ञान तथा अपने समय तक की सम्पूर्ण जैन परम्पर: का अच्छा ज्ञान प्रत्येक श्लोक में स्पष्ट झलकता है। उस समय परस्पर संपर्क, जानकारी आदि साधनों का बहुत अभाव था. फिर भी इन सबके बावजूट इतना विस्तृत विवरण संजोकर ग्रन्थ रूप में सफलतापूर्वक निबद्ध कर लेना, बहुत बड़ी बात है। श्रुतावतार की भाषा, शैली. भाव एवं विषय आदि देखते ही बनता है। गणधर के अभाव में जब श्रुतावतार
SR No.090472
Book TitleShrutavatar
Original Sutra AuthorIndranandi Acharya
AuthorVijaykumar Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size1 MB
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