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________________ द्रव्यभाव व्युत्सर्गी नयाभ *5 सामायिक गाथाए नियत्तिदारे, मावनिंदा 'हा दुटु कतं हा दुटु कारितं दुटु अणुमतं पत्ति । अंतो अंतो इजाति पच्छाता- यास्यावावेण र्निदंतो ॥१२॥ गरहा प्रकाश्ये, परपागडीकरणं, सा चउचिहा, दव्यभूता परपच्चया वा आलोएति गरहति, जथा-आणंदपुरे EMA मरुओ दुसाए सम संवासं कानूण उवज्झायस्स कहेति, जथा-सुविणए ण्डसाए सम संवासं गतोमिति, मावगरिहा-गंतूण गुरुस मीवं कातूण प अंजलिं विणयमलं । जह अप्पणा नह परे जाणवणापस गरहा उ॥१॥ मावगरहाए साधू उदाहारणं ।। ला 'अत सातन्यगमने' अतनीति बाग्मा,तं चोमिगमिनि, दवदिउस्सग्गो गणउवधिसरीरमत्तपाणाण विउस्सग्मो, जो वा धम्माभण्डाणपरत्तो काउस्सग्गादिहिता अट्टवमट्टो तस्मवि दवविउस्मग्गो, अणुवउत्तो वा, तत्त्येव उदाहरणं पसण्णचंदो, भावविउ. स्सग्गो मिच्छत्तप्रमाणअचिरणिं, अहवा कमायसंसारकमाण का विउस्मग्गो, तन्थ पडियागतो पसण्णचंदो उदाहरणं भवनि-जथा अणुभृतो वकलचीरिकहाणगे । M आह-किमिति सामाइककरणाभ्युपगमं पूर्व दर्शयति पच्छा सावज्जजोगवेरमण ?, भणति—यतः सामापिकात्मैव सन् सावज्जजोगविरतो तिविहं तिविहेण पोसिरिय निपात्रो भवति, न पुण सामाइयरहिता । एवं एसो अणुगमो परिसमत्तो। नया इच्छितव्या तत्य नेगमादीया नया सत्त, तेसि विमासा कातव्या जहा हेट्ठा, इमं सामण्णलक्षण-सामाण्यं प्रविभागःप्रत्युत्पर्य कायथा वचः शब्दः । शब्दार्थ च वचः (खलु) प्रत्येक संग्रहादीनाम् ॥ १॥ एवं सब्वे नया परूचेऊण तो सामाइपस्स एगमेकGI पद नएहि सत्तहि मग्गितच्चे, न केवल सामाइयस्स, सवज्झयणाण सुतरखंघाणं । एत्य दारे गयमग्गणा कातन्वा । अहवा |ते सव्वेदि दोसु समोयरंति, विज्जानये चरणणए य, तत्थ णाणणयो-- 0 * KARऊर -1- ॥१९॥ 5-ॐ
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
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