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________________ नमस्कारा धरेति गवित्ति , मो भणनि- मम पंडरओ कागो अहिद्वाण पविट्ठो, ताए सुहिज्जिताण कहितं जाव रण्णा सुर्य, पुच्छितो, कहिय, व्याख्यायालरणा से सुक्क मुक्क, मंती य निउनोनिओ चिट्ठविक्खरणे मागवतो खुड्डग पुच्छति, खुमो भणति- एस चिंतेति- एत्थर विण्हू अत्थि पत्थिनि ।। पुतिः ॥५४८॥ म उच्चारे, धिज्जातियस्स मज्जा तरुणी, गामंतरं णिज्जमाणी धुत्तेण सम लग्मा, गामे ववहारो, विमत्ताणि पुच्छिताणि, आहारविरेयणं दिण्ण, निल्लमोदगा, इयरा धाडिओ। # गये, हत्थी महतिमहाला जो नीलनि तस्स सतसहम्मं देमि, णावाए तोलति, लछित्ता णाकाए उत्तारितूण पाहाणाणं है। सामरिया, जाव से लेहा, पाहाणा तोलिया, पत्तिय तुलनि, जिनो । I घतणो मंडो सञ्चहम्मितो, राया देवीय गुणे कहेति-णिरामयं, सो मणति-ण भवति, किह !, जया पुष्पाणि केस- वाते ढोएति, तहत्ति विण्णामिय, पाए हमिय, णिचंधे कहियं, णिव्विसओ, सुणति, उवादणाण मारेण उवाहितो, उडाहमीताए रुद्धो। गोलो पक्कं पविट्ठो जतुमतो,सलागाए ताचेना कड़ितो। खभो तलागमो, जो तडे संतओ बंधति तस्म सयमहस्सय दिज्जति, तमेव स्वीलम बंधितूण पडिबंधितूण बहो, जितो। ॥५४८॥ खुइए, पारिवाइया मणनि- जो जे करेति तं मए कायर्व कुसलकम्म, खुइओ गतो मिस्वस्स, पडहओ दारितो, गओ Pराउलं, दिवा, सा मणति- कतो गिले १, नेम सागारिय दानियं, जिया, काइएण य पउम लिहिय, सा न तरति, जिता ।
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
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