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________________ j श्री आवत्र मक चूर्णे उपमा निर्बुको ॥३१२॥ रूपं विउब्वति, सागारिमं च मे कमाइययं करेति, जाहे अविरहय पेच्छति ताहे उङ्केति, पच्छा हम्मति, ताहे भगवं चिंतति-एस निरार्म उडाईं करेति असणं च नम्हा गामं चैव न परिमामि चाहि अच्छामि, जने भणति - जहा पंचालदेवी तदा विशुष्यति, तदा किर पंचाला उच्चश्रो, ननो गामम्म चाहिँ निम्तो, जतो महिलाजूहं ततो सागारिएणं कसाइतेणं अच्छति, ताहे किर ढडसिवा पवता, जम्हा संकेण पूर्ति भगवंतहा ठिओ, नाहे सामी चिंतति- एस निरायं उड्डाई करेति तम्हा गामं चैव न अतिमि, एगंते अच्छामि, ताहे संगमओ ओहसति ण सक्कारी तुम ठाणाओ वालेडंति, पेच्छामि ता गामं अतिहि, ताहे सक्को आगतो, पुच्छति भगवं ! जत्ता मे १ जवणिजं च मे १ अब्याबाहं फाविहारं १, वंदित्ता पडिगतो । ओलि खड्डुगरूवं संधिच्छेदो हमोति बज्यो । मोएह इंद्रजालिय तत्थ महाभूतिलो नाम ।। ४-५२।२०९ ।। तासामी ठोसलिंगतो, दाहि पडिमं ठितो, ताहे मो देवो चिंतेति- एस ण पविसति, तो एत्थवि से ठियस्स करेमि, ताहे खुगरूवं बिउब्वित्ता संधि छिंदति, उनगरणेहिं गहिए, बत्तीए तत्थ गहितो, सो भगति मा मं इणह, अहं किं जाणामि, आयरितेग अर्ह पेसितो, कहिं मो?, एम बाहिं असुगउज्जाणे, तत्थ इम्मति बज्झति य. मारिज्जतुति बज्यो गीणिज, तत्थ भूतिलो नाम इंदजालितो, तेण सामी कुंडग्गामे दितो, ताहे सो मोएति, साइति य जहा- एस रामसिद्धत्यपुतो को खामितो य, खुइओ मग्गिओ, ण दिट्ठो, णायं जहा देवो मे उवसग्गं करेति । मोलि संघिसमागममागहओ रद्वितो पितृवयंसो। तोसलि प सस रज्जू बावर्स तोसली मोक्लो॥४-५३१५१० ॥ 12. संगमक कृता उपसर्गाः Ag3M
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
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