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________________ पूर्ण वाहे सामी तेण दिडो, भगवं च गंतूण तत्थ पडिम ठितो, मनुश्तो मर जागनियरिएषाकदवा पच्छा सामि पलोएति है। आवश्यक जाच सोप राति जहा अभ, एवं दो निमि चारे, ताहे गतूण उसति, इसिचा सरचि अवस्कमति मा में उचरि पडिदिति, रकौशि चलायंउपोषाव तहरिण मरी, एवं विधि वारे, साहे पलाएतो अच्छति अमरिसेणे, तम्स तं रूई पलाएंतस्स ताणि बिसमरिताणि अच्छीगिलोय नियुक्ती विजमाताणि, सामिणो कति सोम्मनं च दर्ण, वाहे सामिणा मणियं-उपसम मो चंडकोसिया! उपसमिचि, ताहे वस्स ईहापूह भग्गणगवेसर्ग करेंतस्स जातिस्मरणं समुप्पन, ताहे तिम्बुत्तो आयाहिणपमाहिणं करेला वंदति गर्मसति, पर्मसेचा ताहे मर्च ॥२७॥ | पच्चस्खाति, मणमा नित्थमरी जाणानि, नाहं सो बिले तोंड छोडणं एवं ठिओ, माई रुहो समाजो लोग मारई, सामी | सत्य अणुकंपगडाए अच्छति , तं सामी दछण गोवालगवच्छवालगा अल्लियंति, रुपवहिं बावरेचा अप्पाणं पाहाणे खिवंति, 15 चलतित्ति अल्लाणा, रुदहिं घट्टितो तहविल फंदति, नेहिं लोगस्स सिड, ताहे लोगो जागतु सामि बंदिचा तपि सप्पं बंदवि मईच करेति, अमाओ य धयविक्किणियातो संसप्पं घनेण मक्खंति, फरुमोति सो पिपीलियाहिं महतो, वेषण सम्म |अहियासेति, अबमासम्म कालगतो सहस्मारे उपयो ।। उत्तरषाचाला जागरण वीरेण भाषणं दिव्या । सेयषियाए पपसी पंच रहेणेज्जरापाणो ॥४-१९६४७२।। पच्छा सामी उत्तवाचालं पतो, नत्य पतिसमगपारणए अतिगतो, तत्य जागसेणेण गाहाबविणा खीरभोषणेण पडिला ॥२७॥ |मितो, तरच पंच दिग्वाणि । पच्छा सेपारयं गतो, तत्थ पएमी रामा समयोगतए, सो महेति सकारेति, ततो सुरभिपुर क्चति, WATER RECTRE
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
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