SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 18
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री आवश्यक यूणों जानानि - - सो जीवपएसेईि गहिऊण घेउब्वियसगरेप णितिरति, एवं आहारगेणऽधि, 'तो मासति मासतो मासति मास' तिणाम जति मामतो) माषायाः | मवति तो मासति, किं कारण?, अण्णामि ओरालियवेउवियाहारगा अन्थि,ण पूण मासंति । कम्हा, पज्जत्तिभावा, कारणं वा प्रकार |किंचि पडाच पण भासतिति ।। ८॥ तं पुण मासं कतिप्पगार मेण्डनि?, एत्य मण्णति व्याक्षित्र ओरालिपवेउब्बिय० ॥९॥ ओरालियवेउब्वियआहारगसरांरी उम्विहं भास गेल्हति य मुसह य, तंजहा- सच्च असच्च सच्चामोसं असच्चामोसं च, जाए भासाए गेण्डति ताए चेव णिसिरति, णो अण्णाए घेत्तूण अण्णाए णिसिरइत्ति ||९|| एन्थ मीसो| आइ-कतिहिं समएहिं लोगो' ॥१०॥ गाहा कंठा । आयरिओ आह पउहिं समाहि ॥११॥ जीवो नाई दबाई मामत्ताए गहियाई णिसरति वाणि मिश्याणि वा णिसिरति अमिमाणि वा, जाई मिलाई णिसिरति ताई अर्णतगुणपग्वुिड्डीए परिवङमाणाई २ चउहिं समतेहिं समंतजो लोगंत फुसंति, संति णाम पार्वतित्ति च भवति, जाई अनिमाई गिगिति तोलाको उगाहणावग्गणाओ गता मेदमावजंति, संखेज्जाई जोयणाई गंता विद्वसमागच्छति, विद्धममागच्छनि णामामासीमनिनि वुत्तं भवति । एवमेव जाई मिण्णाई णिसिरति ताई महतलेकसमाई चउहि समरहिं लोगत पावनि, जाणि पुण अमिण्णाणि णिसिरति साणि खुइलगलेढुगसमाणाई अंतरा चेव विद्धसमागच्छंति, | तेहि यामिण्णेहिं मासादब्वेहिं नउहि समएहिं लोगो निरंतरं सब्बो चेव फुडीकओ, जो य लोगस्स चरिमो-अन्तो सो चेव मासाएऽपि परिमो अंतोत्ति । कई, जेण अलोए जीवाजीवदवाणं धम्मत्यिकायदबस्स अमावे मती व पत्थि, अतो लोगस्स चरिमंते मासाएऽवि चरिमंतो भण्णतित्ति ॥११॥ इराणि एयस्स आमिणिषोहियस्स एगडिया भणति, तंजहा
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy