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________________ उपदेश 11 12 11 वाजं च च चखः । तं तद् खोका मायामयविष्यको व ॥ ३५ ॥ डोहापरिएड सम्मं संपछि गुरुलासे । जइ अंतरात्रि कार्ड करिय श्रारागो तहरि ॥ ३६ ॥ खातुं गुरु जो पवई अत्तलो दोसे । सो जइ न जाइ मुस्कं अवस्स वेमानि होड़ ॥ ३७ ॥ ate सम्मं न दु झरे नियस । वलेवो तो तो निसीहताहिं ॥ ३० ॥ nees जूनी उह श्रतो याति त । तत्सनादेश महीनाहो बाजे सहसो ॥ ३९ ॥ तम्मंकुराए दीसंति सुंदरा खेतुरगसंदोहा । वत्थसत्यकलिया जाया हा ॥ ४० ॥ कुठागारा जंमागारा धन्नहिं तह हिंपि । तसाता चरिया वह नइयूरेहिं जलनिदियो ॥ ५१ ॥ वह सीमामा नवा असूयागया इय जयंति । सोऽवि को अस्थि जो जो इलमस्सं अषहरेका ॥ ५२ ॥ इ चाहरियं तो तीरहिए िनरपंजरंतरगजे सो । नो केसवि हरिवंसको सोऽवि जइ एइ ॥ ४३ ॥ वह जंपर एगनरोज घाविवेऽवि तत्बेलो। राया डंपर एवंपि होत न बहेर बगाएं || तत्तो ते सरग्गसि खुदेव कंटएहस्तो । वियो मम्मपरते कहमति समयं बहे ॥ ५५ ॥ सुमेश तेल सह सचि पक्षि व कम्मि । परिहायश पइदिवदं चारितोऽषि अवचारिं ॥ ४६ ॥ राजeिd कह एस जसो बलवि वरतुर । घोरुयवालेचं नाह तयं न तु विभासेमो ॥ 99 ॥ T १ महाधनः. 54 सप्ततिका ॥५१॥
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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