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क्या सत्य का भी प्रायश्चित्त होता है ?
भर्ष- आनन्द श्रमणोपासफ ने भगवान् गौतम स्वामी से निवेदन किया-- "हे भगवन् | क्या जिनशासन में सत्य, तथ्य, सद्भुत भावों की मी आलोचना प्रायश्चित्त है? मैंने जैसा देखा है, वैसा ही निवेदन किया है, तो क्या सस्प बात कहने वाले को मालोचना करनी चाहिए ?" भगवान् गौतम स्वामी ने फरमाया--'नहीं, ऐसी बात नहीं है । सत्पभाषी को आलोचना-प्रायश्चित्त नहीं आता।" तब आनन्द धमणोपासक बोले--"हे भगवन् ! गनि जिनशासन में ऐगी यमस्या है तो आपको इस मृषा-स्थान को आलोचना कर के प्रायश्चित्त लेना चाहिए।"
तए णं से भगवं गोयमे आणदेणं समणोवासपणं एवं वुत्ते समाणे संकिए कंखिए विइगिच्छासमावणे आणंदरस अंतिपाओ पडिणिक्खमइ पडिणिवस्वमित्ता जेणेय दूइपलासे चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्यइ उवाच्छित्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स अदूरसामंते गमणागमणाए पडिकम्मइ पदिक्कमित्ता एसणमणेसणं आलोपड आलोहत्ता भत्तपाणं परिदंसेइ पडिसित्ता समणं भगवं महावीरं बदइ णमंसइ बंदित्ता गमंसित्ता एवं वघासी-" एवं खलु भंते ! अहं तुम्भेहिं अन्भYण्णाए तं व सव्वं कहेइ जाप तग णं आहं संकिए कंखिए बिहगिच्छासमावण्णे आणंवस्स समणोवासगस्स अंतियाओ परिणिक्षमामि पडिणिक्षमामित्ता जेणेव इहं तेणेव हब्वमागए।
___अर्थ-आनन्द श्रमणोपासक के ये वचन सुन कर गौतमस्वामी को अपने कपन के विषय में शंका, कांक्षा, विचिकित्सा हुई । वे वहाँ से चल कर तिपलाश उद्यान में श्रमणभगवान महावीर स्वामी के समीप पधारे । गमनागमन का ईतिथिको प्रतिक्रमण किया और एषणा की आलोचना कर आहार-पानी दिखाया और वंदना-नमस्कार कर कहा-- "हे भगवन् । आपकी मात्रा से में गोचरी गया था, यावत मानन्दजी से हमा वार्तालाप कहा।
" ण मंते : किं आणंदेणं समणोवासपणं तस्स ठाणस्स आलोएयवं आव परिषज्जेय उवाहु मए !" " गोयमा इ! समणे मगचं महावीरे भगवं गोयम एवं