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________________ घी उपासक माग सूप-१ दुपपचउपयपमाणाहक्कमे, धणधपणपमाणाइफम्मे, कुवियप्पमाणाइकम्मे । अर्थ-तवन्तर श्रावक के पांच व्रत 'इच्छापरिमाण' के पांच अतिचार श्रमणोपातक को नानने योग्य हैं, समाचरण योग्य नहीं-१ खुली या ढकी भूमि के परिमाण का अतिक्रमण (उल्लंघन) करना २ सोने-चांदी को मर्यादा का अतिक्रमण ३ द्विपद-दास-दासी आदि, चतुष्पद- गाय-भैस आदि के परिमाण का अतिक्रमण ४ मुद्रा आदि धन और गेहूं आदि मामा के परिमाग का अतिक्रमण करना और ५ कुविय के परिमाण का अतिक्रमण करना। तयाणंसरं च णं दिसिक्यस्म पंच अइयारा जाणियश्या ण समापरियव्या, तं जहा-उड्दादि सिपमाणाइक्कमे, आहोदिसिपमाणाइक्कमे, तिरिपदि सिपमाणाइक्कमे, खेत्तवुड्ढी, सइअंतरद्धा । अर्थ-तदन्तर 'विशावत' के पांच अतिचार जानने योग्य है, आचरण योग्य नहीं है-- ऊंची दिशा में जाने की मर्यादा का अतिक्रमण २ नीची विशा के परिमाण का अतिक्रमण ३ चारों ओर की तिरछी दिशा के परिमाण का अतिक्रमण करना ४ क्षेत्र. वृद्धि-मर्यादित क्षेत्र को बढ़ाना ५ किए हुए भूमि परिमाण को विस्मृति से आगे जाना । तयाणंतरं च णं उवभोगपरिभोगे दुधिहे पण्णत्ते, तं जहा-भोयणाओ य कम्मओ य, तत्थ णं भोयणाओ समणोषासपणं पंच अइयारा जाणिपन्या ण समायरियम्वा, तं जहा~सचित्ताहारे. सचित्तपडिपद्धाहारे, अप्पलिओसाहिमकस. णया, दुप्पउलिओसहिमवखणया, तुच्छोसहिभव खणया, कम्मओ णं समपो. वासरणं पणरस कम्मादाणाई जाणियब्वाई ण समायरियव्वाई, तं जहा-इंगालकम्मे, वणकम्मे, साडीकम्मे, भाडीकम्मे, फोडीकम्मे, दंतवाणिज्जे, लवखवाणिज्जे, रसवाणिज्जे, विसवाणिज्जे, केसवाणिज्जे, जैतपीलणकम्मे, जिल्लंउणकम्मे, दग्गि-दाषणया, सर-वह-तलावसोसणया, असइजणपोसणया। अर्थ-(सातवा) उपमोगपरिभोग दो प्रकार का है--भोजन विषयक और कर्म विषयक । भोजन को अपेक्षा श्रावक के पांच अतिचार कहे गए नो जानने योग्य है आचरण योग्य नहीं है--
SR No.090457
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashakdashang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhisulal Pitaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year
Total Pages142
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Literature, & agam_upasakdasha
File Size3 MB
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