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________________ अथ सप्तदशमोऽध्यायः देवीभिर्देववर्यैश्च तं पदस्तुतिवन्दनैः । पूज्यं सिद्धपदाधीश झ्यरनाथं नमाम्यहं ।।१।। अन्वयार्थ – पदस्तुतिवन्दनैः = चरणों की स्तुति और वन्दना करने वाले, देववर्यैः = उत्तम देवों द्वारा, च = और, देवीभिः = देवियों द्वारा, पूज्यं = पूजे जाने योग्य, तं = उन, सिद्धपदाधीशं = सिद्धपद के स्वामी, अरनाथं - तीर्थडकर अरनाथ को, हि = ही, अहं = मैं, नमामि = नमस्कार करता हूं। श्लोकार्थ - चरणों की बन्दना और स्तुति करने में तत्पर उत्तम वैमानिक देवों और देवियों द्वारा जो पूज्य हैं ऐसे उन सिद्धपद के अधीश्वर तीर्थङ्कर अरहनाथ को मैं प्रणाम करता हूं। तत्कथापूर्वकं तस्य कूटस्य गिरिभूपतेः । माहात्म्यं श्रवणीयं यच्च तद्वक्ष्येऽहं समासतः ।।२।। अन्वयार्थ :- तत्कथापूर्वकं - उन तीर्थकर अरहनाथ की कथा पूर्वक, गिरिभूपतेः = पर्वतराज सम्मेदशिखर का, च = और, तस्य = उस, कूटस्य = कूट का, यत् = जो, श्रवणीयं = सुनने योग्य, माहात्म्यं - महिमा पूर्ण महत्त्व, (आस्ते = है), अहं = मैं, तत् = उसको समासतः = संक्षेप से. वक्ष्ये = कहता हूं। श्लोकार्थ – तीर्थकर अरनाथ की कथा पूर्वक पर्वतराज सम्मेदशिखर का और उस नाटक कूट का जो सुनने योग्य माहात्म्य है उसको मैं संक्षेप में कहता हूं। जम्बूमति महाद्वीपे पूते पूर्वविदेहके | कच्छनामा महादेशो सीतायाः सरिदुत्तरे ||३|| अस्त्य हि सदा भव्याः षट्कर्मनिरतास्तथा । मोक्षं यान्ति च यास्यन्ति नित्यं तत्रा न संशयः ।।४।।
SR No.090450
Book TitleSammedshikhar Mahatmya
Original Sutra AuthorDevdatt Yativar
AuthorDharmchand Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages639
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Pilgrimage
File Size12 MB
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