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________________ २६६ श्लोकार्थ भातुरङ्गे समर्प्यथ देवं बालस्वरूपिणम् । जगाम त्रिदशैस्सार्धं सहर्षस्सोऽमरावतीम् ||३१|| अन्वयार्थ अथ = फिर, बालस्वरूपिणं = बाल स्वरूप वाले, देवं भगवान् को, मातुः = माता की, अङ्के = गोद में, समर्प्य समर्पित करके, त्रिदशैः = देवों के सार्धं = साथ, सहर्षः हर्ष युक्त होता अमरावती को जगाम = चला गया। · हुआ, सः वह इन्द्र, अमरावती — — श्री सम्मेदशिखर माहात्म्य = नवकोटिसमुद्रोक्त्ताऽवसरव्यत्यये चन्द्रप्रभात्तम्यन्तर्वर्त्यायुस्स ww == फिर बालस्वरूपी भगवान् को माता की गोद में समर्पित करके देवों के साथ हर्ष युक्त होते हुये वह इन्द्र अमरावती को चला गया। = प्रभोः । बभूव हि ।।३२।। = अन्वयार्थ – चन्द्रप्रभात् तीर्थकर चन्द्रप्रभ से, नवकोटिसमुद्रोक्तावसरव्यत्यये = यथोक्त प्रमाण वाले नव करोड़ सागर का काल बीत जाने पर, तदन्तर्वर्त्यायुः - उस नौ करोड सागर के भीतर ही परिगणित है आयु जिनकी सः वह पुष्पदंत प्रभु बभूव 1 हुये थे। अन्वयार्थ – सः = श्लोकार्थ - तीर्थङ्कर चन्द्रप्रभ से नव करोड सागर का काल बीत जाने पर उस काल में ही अन्तर्भूत आयु वाले वह पुष्पदंत प्रभु हुये थे । सः कुन्दकलिकाभासः श्वेतवर्णो महाद्युतिः । द्विलक्षमितपूर्वायुः शतकोदण्डदेहभृत् ।। ३३ ।। सः = वह पुष्पदंत, कुन्दकलिकाभासः = कुन्दपुष्प के समान, श्वेतवर्णः = श्वेत रंग वाले, महाद्युतिः = महान् कान्ति वाले, द्विलक्षमितपूर्वायुः दो लाख पूर्व की आयु वाले, (च = और), शतको दण्डदेहभृत् = एक सौ धनुष ऊँची देह को धारण करने वाले, ( आसीत् = थे) । -m श्लोकार्थ वह पुष्पदंत भगवान् कुन्दपुष्प की आभा के समान श्वेत रंग
SR No.090450
Book TitleSammedshikhar Mahatmya
Original Sutra AuthorDevdatt Yativar
AuthorDharmchand Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages639
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Pilgrimage
File Size12 MB
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