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________________ स्या. क. टीका - हिन्दीविवेचन ] [ ७५ रिक उपमान प्रमाण की कल्पना नियुक्तिक है। " सो यह ठीक नहीं है क्योंकि 'अयं गोसदृशः ' तथा 'अयम् अतिदीर्घग्रीवः कठोरकण्टकाशी इन दोनों शानों का अतिदेशवाक्यजन्य शान में पदवाच्यत्व के धर्मितावच्छेदकरूप में जो धर्म भासित होता है तत्प्रकारकज्ञानत्वरूप से, अनुगम कर के शान प्रथा वैवगन दोनों की अनुगतरूप से पदवाच्यत्व की उपमिति का कारण मानने से व्यभिचार का परिहार हो सकता है, क्योंकि नियम ऐसा है कि अनिदेश वाक्य से विशिष्ट में यत्पदवाच्यत्य का ज्ञान होता है तद्वप्रकारकज्ञान पद्धर्मविशिष्ट में उत्पन्न होता है तद्धर्मविशिष्ट में तत्पदवाच्यत्व की उपमिति होती है । जैसे 'गोसटशी गवयः इस अतिदेशवाक्य से जन्यज्ञान में गोसायविशिष्ट में गवयपदवाच्यत्व का ज्ञान होने से 'गोसादृश्य' अतिदेशवाकरजन्यज्ञान में गवाच्यत्व का धर्मितायच्छेक होता है अतएव गोमरूप धर्म का वयत्व आदि यद्धर्मविशिष्ट में ज्ञान होता है तद्धर्भविशिष्ट में वाच्यत्व की उपमिति होती है। इसीप्रकार अतिदीर्घग्रीवः कठोर कण्टभक्षी पश्वकर विधर्मा करवाच्यः इस अतिदेशवाक्य जन्यज्ञान में अतिवीर्यत्व एवं कठोरकण्टकश्रीन्य यह धर्मयुगः करभपदवाच्यत्व का धर्मितावच्छेदक होता है। अतः इस धर्मयुग का इदन्य करमत्व आदि धमें से विशिष्ट में ज्ञान होने पर उक्त धर्मविशिष्ट में करमपदवाच्यत्व की उपमिति होती हैं। इस प्रकार उत्तरीति से उपमिति के प्रति साधम्यज्ञान एवं वैधर्म्यज्ञान के व्यभिचार का कारण हो जाने से उक्त उभयज्ञान को उपमिति का कारण मानने में कोई बाधा न होने के कारण उपमानप्रमाण का अभ्युपगम करने में कोई बाधक नहीं हो सकता | 1 2 अथवा उपमिति के प्रति साधम्र्य और वैधभ्यंज्ञान में प्रदर्शित व्यभिचार का धारण करने के लिये यह कहा जा सकता है कि जैसे मत्तलिङ्गक अनुमिति में तनलिङ्गपरामर्श को कारण मानने से अनुमिति और परामर्श के कार्यकारणभाव में प्रसक्त व्यभिचार का परिहार होता है उसी प्रकार साधम्यज्ञान से होनेवाली उपमिति के प्रति साधम्र्म्यज्ञान को और शान से होनेवाली उपमिति के प्रति वैधम्येज्ञान को कारण मानने से उपमिति और साधस्य वैधम्र्य ज्ञान के कार्यकारणभाव में मसक्त व्यभिचार का परिहार हो सकता है। तथा इसी प्रकार कार्यकारणभाव मानना उचित भी है क्योंकि इस प्रकार कार्यकारणभाव मानने पर अप्रामाण्यज्ञान से आस्कन्दित साधर्म्यज्ञान और वैधज्ञान से उपमिति की उत्पत्ति होने की आपत्ति का परिहार करने के लिये साधर्यज्ञान और वैधम्यंज्ञान में विद्यमान उपमितिकारणता की अच्छे कोटि में साधर्म्यविषयक अप्रामाण्य ज्ञानाभाव और वैधविषयक अप्रामाण्यवानाभाव का निवेश कर इस प्रकार कार्यकारणभाव की कल्पना की जा सकती है कि साधर्म्यज्ञान से होनेवाली अनुमिति में साधम्मेविषयक अप्रामाण्यज्ञानाभावविशिष्टसाधर्म्यज्ञान कारण है एवं वैधज्ञान से होनेवाली उपमिति में धर्म्यविषयक अप्रामाण्यज्ञानाभाव विशिष्ट वैषम्यंशान कारण है । किन्तु यदि साधक - वैधर्म्य दोनों का दवाध्यत्व के धर्मितावच्छेदकत्वरूप से अनुगम कर पदवाच्यत्व की उपमिति में पदवाच्यत्व के धर्मिकीभूतधर्ममकारकज्ञानत्वरूप से अनुगत कारणता मानी जायगी तब कारणतावच्छेदक कोटि में साधर्म्यविषयक अप्रामाण्यज्ञानाभाव का निवेश करने पर साधर्म्य विषयक अप्रामाण्यज्ञानाभाव दशा में विषयक प्रमाण्यज्ञान से आस्कन्दित वैधशान से उपमिति की आपत्ति होगी, एवं वैधर्म्यविषयक अप्रामाण्यज्ञानाभाव का निवेश करने पर उस अभाव की दशा में साधयविषयक अप्रामाण्यज्ञान से आस्कन्दित साधम्येशान से उपमिति की आपति होगी। यदि साधर्म्यविषयक अप्रामाण्यज्ञानाभाव एवं वैधर्म्यविषयक अप्रामाण्यज्ञानाभाव दोनों का निवेश होगा तो वैधस्य
SR No.090423
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 9 10 11
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages497
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size16 MB
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