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________________ ७२ । शास्त्रवास्ति० श्लो०२ प्रकरणान्तरगत अर्थ के परामर्श में समर्थ ऐसे सुबन्तपद से अन्य प्रकरण में प्रसिद्ध कर्मों का परामर्श मानकर उनके साथ फलसम्बन्ध मात्र के विधान की लपपत्ति सम्भव होने पर, ऐसे वचनों में जिन में कविधि का श्रवण नहीं होता-अपूर्वविधित्व को कल्पना अनुचित है । इसलिये ऐसे बचनों से निदिष्ट कर्म में कर्मान्तरत्व मानना असम्भव है। इसीलिये 'सर्वेभ्यो दर्शपूर्णमासौ' इस वचन को भी दर्शपूर्णमास का सम्पूर्ण फलों के साथ सम्बन्ध मात्र के बोधन में ही तात्पर्य माना जाता है । उस में चचित दर्शपूर्णमास प्रसिद्ध दर्शपूर्णमास से कर्मान्तर नहीं होता। मोमांसाशास्त्र में यह कहा भी गया है कि-इस वचन में दर्शपूर्णमासशब्द से प्रसिद्ध दशंपूर्णमास का विधान नहीं होता किन्तु वचनान्तर से अप्राप्त सर्वकामार्थता यानी सर्वपलसम्बन्ध का ही विधान होता है। ननु किमत्र पशुकामस्योद्भिच्चित्रादिष्विव विविदिषादिकामस्य यज्ञादिषु विकल्पः, उत स्वर्गकामस्याग्नेयादिष्विव समुच्चयः ? इति चेत् । अत्र केचित्-'यज्ञादीनामेकवाक्यगतत्वेन दर्शादिवत् समुच्चयः' इति वदन्ति । तत्रैकवाक्यत्वमर्थैकत्वात, यथा 'अग्निहोत्रं जुहोति' इति । 'अरुणयकहायन्याः' इत्यादौ सत्यप्यारुण्याद्यर्थ मेदविशिष्टक्रियाविधानादेकवाक्यत्वम् । सत्याप च विशिष्टविधानस्य गौरवग्रस्तत्वेऽगत्या तदाश्रयणम् । क्रियायाः प्रकरणान्तरप्राप्ती हि विशेषणमात्रविधानम् , यथा 'दधना जुहोति' इति, तत्राप्येकमेव विशेषणं विधातु शक्यते, नानेकम् , वाक्यभेदप्रसङ्गात् । अप्राप्ता हि क्रियाऽनेक विशेषणान्युपसंगृती विशिष्टा विधातु शक्या, प्राप्तायां तु तस्यामनेकार्थविधाने विधिप्रत्य. यावृतिलक्षणो वाक्य भेदः । तदुक्तम्--"प्राप्ते कर्मणि नानेको विधातु' शक्यते गुणः" इति अत्र च 'कर्मणि' इत्युपलक्षणम् , प्राप्तमात्रमुद्दिश्यानेकविधानस्याऽशक्यत्वात् । अत एव 'ग्रहं संमाष्टि' इत्यत्र ग्रहोद्देशेनैकत्व-संमार्गयोविंधाने वाक्यभेदः ! एकोद्देशेनानेकविधानवदनेको शेनेकविधानमध्यशक्यम् , यथाऽत्रैवैकत्वग्रहोदे शेन संमार्गविधानम् । तदत्र 'विविदिषन्ति' इत्यत्र न तावदरुणादिवाक्यवदेकविशिष्टक्रियाविधायकत्वम्, असंभवात् , अनंगीकृतेश्च, येन तदेकवाक्यत्वम् । नापि 'दना जुहोति' इतिवत् कस्याचित् क्रियायामेकविशेषणविधानम्, उक्तहेतोरेव, यज्ञदानादीन्युद्दिश्य विविदिषाफलसंबन्धविधाने एकत्वग्रहोद्देशेन संमार्गविधानवद् वाक्य भेदः, विविदिषाफलं चोद्दिश्य यज्ञदानादिविधाने ग्रहोद्द शेनैकत्वसंमार्गविधानवद् वाक्यभेदः । [ यज्ञदानादि कर्तव्य विकल्परूप से या समुच्चयरूप से ] 'तमेतं वेदानुवचनेन०' इस वाक्य के सम्बन्ध में यह प्रश्न होता है कि जैसे 'उद्भिदा यजेत पगुकामः पशु को कामना वाला उद्भिद्नामक याग करें' एवं "चित्रया यजेत पशुकामः पशु को
SR No.090422
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 8
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages178
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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