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________________ संदेह विपय विषय पृष्ठ का०४-वेदान्तमत निरसन-उत्तर पक्ष निर्वचन के निमित्तविरह की बात गलत ११४ प्रारम्भ इदमाकार-रजताकार वृत्तिभेद मानमे फा० ५ द ए मतिया में प्रमाणाभार ९८ पर आपत्ति का०६-प्रमाण-प्रमेय भेदापत्ति ..... ९५ स्वप्न में भासमान रथादि अनिर्वचनीय का०७-अद्वैतवाद में स्वशास्त्रबाट ९९ नहीं ११५ 'विद्यां च.' इत्यादि श्रुति का अन्य अर्थ १०० मलाज्ञान से स्वप्नादि उत्पत्ति की आशंका ११५ साध्य-सिद्धि में भेद होने से अद्वं तबाध १०० मिथ्यात्व प्रतीति के अभाव की आपत्ति ११६ 'तत्त्वमसि' वाक्य में उपासनार्थता का स्वप्नज्ञानीय पदार्थ में सर्वत्र मिथ्यात्व की बुद्धि असिद्ध ... वेदों का अर्थ सुनिश्चित नहीं है दृष्टि सृष्टिवादी वेदान्तो का पूर्वपक्ष ११८ युक्तिसंगत अथे में वेदवाक्यप्रामाण्यशंका १०१ देवता शरीरवत् दृष्टिवाद में दृश्य का अद्वैतवाद में अनुभवबाध अनिवार्य अभाव ११६ प्रत्यक्ष केवल विधात नहीं है .... १०३ । दृष्टिसृष्टिवाद का प्रतिक्षेप-उत्तर पक्ष १२० भेदप्रत्यक्षानुपपत्ति शंका का उत्तर १०३ ।। एक ही काल में अज्ञान से सकल कार्य देशकालभेदमूलकता में अनवस्था का आपत्ति प्रतिक्षेप १०४ दृष्टि गृष्टिवाद में दोषपरम्परा १२१ अभेदमिथ्यात्व कल्पना में लाघव भ्रमोत्पादयः अज्ञान से अधिष्ठान ज्ञान का अनुगत न होने से भेद अपारमाथिक होने असंभव १२२ की शंका का उच्छेद .... १०५ स्वप्नवत याग से स्वर्गोत्पाद प्रसक्ति विषय में सत्त्व की कल्पना अनिवार्य १०५ परचित्ताग्रहण का अनिष्ट ..., १२४ प्रपंच प्रतिभास भ्रान्त होने से उसके प्रविद्या में प्रमाणाभाव १२४ मिथ्यात्व को शंका का उच्छेद..... अज्ञान सर्वात्मना स्वरूपज्ञानाभावरूप नहीं १२५ सर्वज्ञताभिमानी पुरुष में योगितुल्यता की वेदान्तीनओं का महाविद्यानुमान-पूर्वपक्ष १२६ आपत्ति .... .... धारावाहिक ज्ञानस्थल में बानिवारण १२७ स्वाभावसामानाधिकरण्यरूप मिथ्यात्व अनुमितिज्ञान में बाध निवारण १२७ की घट में भो आपत्ति .... 'पीतः शंख:' भ्रम की उच्छेदका का सत्त्वांश में सत्त्वान्तरोत्पत्ति की आपत्ति १०६ निवारण .... .... १२८ लोक-शास्त्र प्रसिद्ध कार्यकारणभाव का 'स्वप्रागभावव्यतिरिक्त विशेषण सार्थकता १२९ भङ्ग १०६ 'स्वनिबत्य' विशेषण की सार्थकता १२९ बाधित के व्यवहार की आपत्ति.... ११० स्वदेशगत विशेषण की भ्रमानुमिति में वह्नि अपरोक्षता की 'अप्रकाशित १३० आपत्ति ..... .... हेतु-असिद्धि शंका का निवारण इदंस्वविषयक वृत्ति मानने पर आपत्ति ११२। दृष्टान्त में हेतु-असिद्धि शंका का बारण १३० 'इमे शुक्तिरजते' इस भ्रमज्ञान में प्रामा स्मृतिस्थल में अनैकान्तिक दोष का, १३१ ण्यापत्ति ..... .... ११२ आय विशेषण व्यर्थता की शकाका बारण १३१
SR No.090422
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 8
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages178
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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