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________________ स्या० क० टीका एवं हिन्दी विवेचन 1 बाध प्रसक्त होगा। अतः पक्षा में उक्त विशेषण देकर सुखाविज्ञान में पक्षान्तर्गतत्व का परिहार किया गया है। नापि धारावाहिकज्ञाने बाधः, एकस्या एत्र वृत्तरेतावमवस्थानाऽसंभवेन तदभावात , भावे वोक्तविवादगोचरत्वाभावेन पक्षताया अभावात् । न च घटादिनाने स्वविषयस्य घटादेजेंडत्वेन तदावरणाभावाद् वाधा, घटावच्छिनचैतन्यस्यैव धृत्तिरूपघटादिज्ञानविषयत्वात् । अज्ञानेन तत्रावरणजननात, अज्ञानविषयत्ववज्ज्ञानेनापि सत्रैव तमिसिजननाज्ञानविषयत्वो पपत्ते, ज्ञाना-ज्ञानयोः समान विषयत्वप्रसिद्धः, अदरविप्रकर्षण घटादेरुमयविषयस्वव्यपदेशात् । नाप्यनुमितिज्ञाने बाधः, तस्याप्यज्ञाननिवर्तकत्वात् । न च परोक्षज्ञानादशाननिवृत्तावपरोक्षभ्रमनिवृत्तिप्रसङ्गा, इष्टापत्तेः, 'रज्जुरियं न सः' इत्याप्तोपदेशे तद्दर्शनात् । धारावाहिक ज्ञानस्थल में बाघ का निवारण ] धारावाहिकज्ञानस्थल में द्वितीयादिज्ञान में भी बांध नहीं हो सकता, क्योंकि वेदान्तमत में एक ही अर्याकारवृत्ति का लम्बे समय तक अवस्थाम सम्भव होने से उस मत में धारावाहिक ज्ञान का अभाव है। यदि हो तो भी धारावाहिक स्थल में द्वितीय विज्ञान में वेदान्ती को भी प्रज्ञानपूर्वकत्व मान्य न होने से वह विवाद का गोचर नहीं है। अतः वह पक्षान्तर्गत ही नहीं है । यदि यह कहा जाय कि-'घटादि ज्ञान में बाध होगा क्योंकि उसका विषय घटादि जड़ है अत एव उसमें आवरण नहीं है। अत: स्वपद से घटादि ज्ञान को लेने पर स्वविषयावरण को प्रसिद्धि न होने से अन्यत्र प्रसिद्ध स्वविषयावरणधटित साध्य का घटाविज्ञान में अभाव है।'-तो यह ठीक नहीं है. क्योंकि घटावच्छिन्न चैतन्य ही वृत्तिरूप घटादिज्ञान का विषय होता है और उसका प्रज्ञान से प्रावरण होता है। प्रतः स्वपद से घटादिज्ञान को पकड़ने पर स्वविषयावरण की अप्रसिद्धि नहीं हो सकती । क्योंकि घटावधिन चैतन्य जैसे अज्ञान का विषय होता है उसी प्रकार घटादिज्ञान का भी विषय होता है; ज्ञान से उसो में अज्ञान की निवृत्ति होती है, वयोंकि ज्ञान और अज्ञान में समानविषयकत्व का नियम है। अज्ञान एवं वृत्तिरूप ज्ञान का घटादि साक्षात् विषय नहीं होता किन्तु उसके विषयभूत चैतन्य से अदूरविप्रकृष्ट यानो संनिहित होने से उसमें उभयविषयत्व को व्यवहार होता है। [ अनुमितिञान में बाध निवारण | अनुमितिरूपज्ञान में भी बाध नहीं हो सकता, क्योंकि यह भी अनुप्रीयमान वस्तु में असत्यागदक अज्ञान का निवर्तक होता है, अतः उसमें उक्त मन्यवस्तु पूर्वकत्वरूप साध्य विद्यमान होता है । आशय यह है कि अज्ञान के दो भेद हैं-(१) असस्वापादक प्रज्ञान और (२) अभानापावक प्रज्ञान । पहले अज्ञान से 'नास्ति' इस व्यवहार का जन्म होता है और दूसरे से न भाति' इस व्यवहार का जन्म होता है । इनमें प्रथम प्रशान की निति अनुमिति आदि परोक्षज्ञान से भी होती है और द्वितीय अज्ञान की निवृत्ति प्रत्यक्षज्ञान से ही होती है । इसीलिये अनुमिति के पूर्व जो पक्षे साध्यं नास्ति' यह व्यवहार होता है वह अनुमिति के बाद नहीं होता, क्योंकि अनुमिति से उस व्यवहार का प्रयोजक अज्ञान नष्ट हो जाता है । पौ साध्यं न भाति' यह व्यवहार तभी अवरुद्ध होता है जब प्रत्यक्ष द्वारा अभानापादक अज्ञान को नियत्ति हो । प्रत्यक्षाज्ञान से दोनों ही प्रकार के ज्ञान की नियति होती है, इसलिये भूतल
SR No.090422
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 8
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages178
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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