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________________ १७४ [ शास्त्रवा० स्त० ६ श्लो० ३७ है । कार्यकारणभाव को इस रूप में परिवर्तित कर देने पर नोलपीतकपाल से उत्पन्न घट में उत्पन्न होने वाले व्याप्यवृत्तिनीलरूप का पोतावयवावच्छेदेन घट के साय चक्षु का संनिकष होने पर प्रत्यक्ष नहीं प्रसक्त हो सकता। क्योंकि उस घर में विद्यमाननीलरूप एतस्कपालानवच्छिन्नवृत्तिक जो तन्नोलान्य, उससे भिन्न एतद्घटसमवेत हो जाता है. अत एव एतत्कपाल के साथ उसका प्रत्यक्ष तभी हो सकता है जब एतत्कपालाबच्छेदेन एततघट के साथ चक्षुःसंनिकाई हो । अतः पोतावयवावच्छेदेन घट के साथ चक्षुःसंयोग होने पर नील के चाक्षुष की आपत्ति नहीं होगी। उक्त कार्यतावच्छेदक के शरीर में एतत्कपालानवच्छिन्नत्तिकत्व यदि तन्नीलान्य का विशेषण न बनाया जायगा तो एतत्कपालावच्छिन्नसंयोग तन्नीलान्यभिन्न न होगा । अतः इस का प्रत्यक्ष एतत्क्रपालावच्छेदेन एतदघट के साथ चक्षःसनिकर्ष के कार्यतावच्छेवक से आक्रान्त न होने के कारण उक्तसंनिकर्ष के विना भी उमके प्रत्य होगी । इसीप्रकार उक्तकार्यतावच्छेदक में तन्नीलान्यत्व का प्रवेश न करने पर एतत्कपालानवच्छिन्नवृत्तिकभिन्न एतत्घटसमवेत का ही प्रवेश होगा। फलतः नीलपीतकपालारधघट में उत्पन्न नीलरूप व्याप्यवृत्ति होने के कारण एतत्कपालानवच्छिन्नत्तिक होगा। अतः तद्धिन्न एतद्घटसमवेत में इस का समावेश न होने से उसका प्रत्यक्ष भी उक्तसंनिकर्ष के कार्यतावच्छेदक से आक्रान्त न हो सकेगा। अतः उक्त संनिकर्ष के अभाव में भी पीतावयवावच्छेवेन घासंनिकर्ष होने पर उस के प्रत्यक्ष की अपत्ति दुरि होगी । एवं यदि उक्तकार्यतावच्छेदक कोटि में तन्नोलान्य के स्थान में केवल नोलान्यमात्र का प्रवेश किया जायगा तो परस्पर व्यवहित दो पीत और दो नील कपालों से उत्पन्न घट में जो दो नीलरूप उत्पन्न होंगे, दोनों ही एतत्कपालानवच्छिन्नवृत्तिक नीलान्य एतद्घटसमवेत रूप होंगे अतः अन्यकपालगल नोलरूप से उत्पन्न घटगत नोलरूप का प्रत्यक्ष भी एतत्कपालावच्छिन्नचक्षुःसंनिकर्ष के कार्यतावच्छेवक से आक्रान्त हो जायगा । अतः प्रन्यकपालावच्छिन्नचक्षसंयोग के अभाव में भी एतत्कपालावच्छेवेन चक्षुःसंयोग होने पर भी इसके प्रत्यक्ष की आपत्ति होगी। इसोप्रकार उक्त कार्यतावच्छेदक कोटि में यदि एतत्घटसमवेतत्व' का यदि निवेश न किया जायगा तो एतत्कपालाना न्नवृत्तिक तन्नोलान्य से एतत्कपाल का प्रावारकवस्त्र भी संयोग सम्बन्ध से द्रव्य के अव्याप्यवृत्तित्वपक्ष में एतत्कपालानवच्छिन्नत्तिकतन्नीलान्यभिन्न होगा। अतः तद्विषयकसाक्षात्कार भी एतत्कपालावच्छेदेन चक्षुसंयोग के जन्यतावच्छेदक से प्राधान्त हो जायगा । तथा उसका 'एतत्कपाले वस्त्रम्' इस प्रकार का साक्षात्कार भी एतत्कपालावच्छेवेन एतद्धचक्षुःसंयोग के कार्यतावच्छेदक से आक्रान्त हो जायगा, किन्तु उक्तसंयोग स्वाश्रयसमवेतत्व सम्बन्ध से वस्त्र में नहीं है अतः वस्त्र के उक्त प्रत्यक्ष की अनुपपत्ति हो जायगी। तन्न, तबाहेतुतायामतिगौरवान्, तत्कपालावच्छिन्नप्रत्यक्ष एव तत्कपालावच्छिन्नसंनिकपस्य हेतुत्वात् । किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि तत्कपालावच्छिन्न प्रत्यक्ष में तत्कपालावच्छिन्न संनिकर्ष कारण है । इस कार्य-कारणभाव को अपेक्षा उक्त कार्यकारणमाष में महान् गौरव है। केचित्त-नानारूपवदवयवारब्धो नीरूप एव घटः, स्वाश्रयसमवेतवृत्तित्वसंवन्धेनैव रूपस्य द्रव्यतत्समवेतचाक्षुषसाधारण्येन हेतुत्वादेतच्चाक्षपत्वात्' इत्याहुः । तन्नेत्यपरे-चित्रकयालिकास्थले तदसंभवात् । अन्ये तु- उद्भूतैकत्वस्याऽयोग्यव्यावृत्तधर्मविशेषस्यैव वा द्रव्य
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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