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________________ स्या० क० टीका एवं हिन्दी विवेचन ] १७३ जा सकती क्योंकि भिन्न-भिन्न अवयवद्वयमात्रावच्छेदेन इन्द्रिय-संनिकर्ष होने पर भिन्न-भिन्न चित्ररूप का उपलम्भ होता है । किन्तु यदि जाति को श्रव्याप्यवृत्ति माना जाय तो उन सभी जातियों से अर्थात् नीलत्व- पीतत्व रक्तत्व आदि अव्याप्यवृत्ति जाति से आश्लिष्ट एक चित्र की उत्पत्ति मानी आ सकती है। क्योंकि एक रूप में अवच्छेदकभेद से उन सभी जातियों का समावेश हो सकता है । परेतु - ' तत्र व्याप्यवृत्तीन्येव नील-पीतादीन्युत्पद्यन्ते, नीलादिकं प्रति नीलेतरादिप्रतिबन्धकत्व-नीलाभावादिकारणत्वकल्पनापेक्षया व्याप्यवृत्तिनीलपीतादिकल्पनाया एव न्याय्यस्वात्' इत्याहुः । तन्ने त्यन्ये- नीलकपालावच्छेदेन चक्षुः संनिकर्षे पीतादेरुपलम्भापत्तेः, नीलाद्यवयवावच्छेदेन संनिकर्षस्य नीलादिग्राहकत्वकल्पने च गौरवात् । [ व्याप्यवृत्ति नीलपीतादि उत्पत्तिवादी अन्य मत ] कतिपय अन्य विद्वानों का इस सम्बन्ध में एक और मत है, वह यह कि नीलपीतादि कपालों से उत्पन्न घट में व्याप्यवृत्ति हो नीलपीतादि की उत्पत्ति होती है । क्योंकि चित्ररूपादि के मत में, नीलपीतकपालारब्ध घट में नीलादि को उत्पत्ति के परिहार के लिये नीलादि के प्रति नीलेतरादि को प्रतिबन्धक मानना और नीलपीतकपालारब्ध घट में व्याप्यवृत्ति नीलादि की उत्पत्ति मानने वाले के मत में नीलादि प्रतियोगीमाभावादि को कारण मानना इस को अपेक्षा नीलपीतावि कपालारब्धघट में व्याप्यवृति नीलपीतादि की उत्पत्ति की कल्पना ही लाघव से न्यायसंगत है । कुछ लोग इस मत का यह कह कर निराकरण करते हैं कि नीलपीताद्यारम्धघट में व्याप्यवृत्ति नीलावि की उत्पत्ति मानने पर नीलकपालावच्छेवेन चक्षुः संनिकर्ष होने पर भी पीतादि के प्रत्यक्ष की आपत्ति होगी। यदि इस आपत्ति के परिहारार्थं नीलादि श्रवधवावच्छेदेन चक्षुः संनिकर्ष को नीलादि का ही ग्राहक मानेंगे तो गौरव होगा । यत्तु - 'एतत्कपालावच्छिन्न संयोगादिप्रत्यक्षानुरोधेनैतत्कपालानवच्छिन्नवृत्तिकत्वे सति यत्तन्नीलान्यत्तद्भिन्नं यदेतद् घटसमवेतं तस्यैतत्कपालविषयक साक्षात्कारं प्रत्येतत्कपालावच्छेदेनैतद्यदचक्षुः संनिकर्षस्य हेतुत्वाद् न पोतावयवावच्छेदेन संनिकर्षे नीलादिचाक्षुषापचिः' इति । [ पीतावयव में नील चाक्षुष आपत्ति का प्रतीकार ] कुछ विद्वानों का यह कहना है कि व्याप्यवृत्ति नीलादि को उत्पत्ति मानने पर पीतावयवावच्छेदेन चक्षुः संनिकर्ष से नीलादि के चाक्षुषप्रत्यक्ष की आपत्ति का परिहार करने के लिए किसी नवीन कार्यकारणभाव को कल्पना करना आवश्यक नहीं है किन्तु एतत्कपालाबसिंयोग आदि का प्रत्यक्ष एतत्कपालावच्छेदेन चक्षुः संनिकर्ष से ही होता है अतः एतत्कपालावच्छिन्न संयोगादि प्रत्यक्ष के प्रति जो एतत्कपालावच्छेदेन एतद् घट के साथ अक्षुः संनिकर्ष की कारणता होती है उस कारणता से निरूपित कार्यवच्छेदक में किञ्चित् परिवर्तन करने से ही उक्त प्रापत्ति का परिहार हो सकता है । जैसे यह कहा जा सकता है कि एतत्कपालानवच्छिन्नवृत्तिक जो तनीलान्य, उससे भिन जो एतद्धटसमवेत, तद्विषयक जो एतत् कपालविषयक प्रत्यक्ष उसके प्रति एतत्कपालावच्छेदेन एतद्घटचक्षुः संनिकर्ष कारण
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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