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________________ स्या० क० टीका-हिन्दी विवेचना ] अथवा, आरोग्यसम्बन्धसामान्ये यदधिकरणानुयोगिकत्वयत्प्रतियोगिकत्वोभयाभावस्तदकिरणज्ञानत्वमेव तत्सम्बन्धावच्छिनतत्प्रतियोगिताका भावत्वम्-इत्याहुः | [ -३‍ [ प्रतियोगिमज्ञान भिन्न श्रधिकरराज्ञान रूप प्रभाव ) भूतल में घटविषयक अज्ञानवशा में घटानवगाही भूतलज्ञान सम्भव होने से उस दशा में भी भूतल में घटाभाव की प्रापत्ति का परिहार करने के लिये प्रभाव का एक अन्य प्रकार से मो लक्षण किया जा सकता है । जैसे, जो वस्तुतः प्रतियोगी का प्राश्रय हो उसके ज्ञानसे भिन्न प्रधिकरण का ज्ञान ही उसका श्रम व है । यह लक्षण करने पर उक्त थापत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जिस समय मूतल में घट विद्यमान होगा उस समय का भूतल ज्ञान वस्तुतः घटवद्विषयक ज्ञान हो जाता है । प्रतः एव उस समय का भूतलज्ञान वस्तुगस्या प्रतियोगिमद्विषयक ज्ञानसे भिन्न अधिकरणजान रूप न होनेसे घटाभावरूप नहीं हो सकता । इस विषय का स्पष्ट नियंचन इस प्रकार हो सकता है- 'स्वकालावच्छेदेन स्वविषयवृत्तितत्कालीनज्ञानभिन्नज्ञानम् तदभावः' : भूतल में घटज्ञानकाल में होनेवाला भूतल ज्ञान स्वकालायच्छेवेन स्वविषय भूतल में विद्यमान घट का समानकालीन हो जाता है । श्रत एव वह उससे मिन नहीं होता है, प्रत एव यह ज्ञान घटाभावरूप नहीं होता । जिस समय भूतल में घट नहीं होता उस समय का भूतल ज्ञान स्वकालावच्छेदेन स्वविषय ( भूतल ) वृत्ति घट का श्रसमानकालीन होता है, अत एक वही ज्ञान घटाभाव रूप हो सकता है । प्रकाश श्रादि का अभाव प्रधिकरणज्ञान सामान्यरूप ही है । क्योंकि प्राकाश श्रादि का कोई अधिकरण न होने से प्राकाशादि प्रभाव के सम्बन्ध में घटाभाव जंसी श्रापत्ति न हो सकेगी । यद्यपि घटादिप्रभाव और प्राकाशादि प्रभाव का इस प्रकार पृथक् निर्वचन करने पर लक्षण का अननुगम होता है, अर्थात् सभी प्रभाव का एक साधारण लक्षण नहीं हो पाता । तथापि प्रभाव निर्वाचन की इस व्यवस्था में दोष नहीं है क्योंकि, घटादि का प्रभाव वृत्तिमत्प्रतियोगिक प्रभाव है और प्राकाशावि का प्रभाव प्रवृतिमत्प्रतियोगिक प्रभाव है । अतः लक्ष्य का भेद होनेसे लक्षण में भेव होना उचित ही है । यदि सभी प्रभावों का एक हो लक्षण करने का श्राग्रह हो तो वह भी दुष्कर नहीं हैं जैसे( श्रारोप्य सम्बन्ध में उभयाभावघटित श्रभावव्याख्या ) 'प्रारोप्य संबन्ध सामान्य में यदधिकरणानुयोगिकत्व यत्प्रतियोगित्व इन दोनों का प्रभाव हो, उस अधिकरण का ज्ञान तत्सम्बन्धायन प्रतियोगिताकतदभाव रूप होता है ।" यह लक्षण आकाशादि के प्रभाव में भी घट सकता है। क्योंकि, प्राकाश कहीं मो किसी भी सम्बन्ध से नहीं रहता । श्रतः सभी सम्बन्ध श्राकाश के श्रारोप्यसम्बन्ध हैं और उन सभी सम्बन्धों में श्राकाशप्रतियोगिकत्व तथा सर्वानुयोगिकत्य उमय का अभाव है अतः सभी वस्तु का ज्ञान श्राकाश-प्रभाव रूप होता है । भूतल में जब घटका संयोग नहीं होता उस समय संयोग भूतल और घट का प्रारोप्य सम्बन्ध होता है, उसमें भूतलानुयोगिकत्व-घट प्रतियोगिकत्वोभय का प्रभाव होने से उस समय का भूतलज्ञान संयोगसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताका नाव रूप होता है। प्रारोप्यसम्बन्ध सामान्य का अर्थ है- 'अमुकाविकरणविशेष्यक प्रमुक प्रतियोग्युपलम्भापादक- आरोप विषयप्रमुक सम्बन्धसामान्य । संयोगसम्बन्ध घटअद्भूत विशेषकघटोपलम्भापादकारोपविषय सम्बन्ध सामान्य के अन्तर्गत नहीं आ सकता क्योंकि घटवभूतल में संयोग विद्यमान होने से उसमें उसका आरोप संभव नहीं हैं, फलतः घटवद्भूतल विशेष्यक घटोपलम्भापादकारोपविषय संयोगसामान्य में घटषभूतलानुयोगिक-घट प्रतियोगिको
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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