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________________ विषय समवायसिद्धि के लिये विशिष्टबुद्धि में संसर्गविषयता का अनुमान ११३ अनन्त स्वरूप की संसर्गता में गौरव और एक समयाय में लाघव असंगत ११३ संबंध के एकस्व - अनेकत्व में लाघव अवतार पूर्वपक्ष ११६ लाघव कल्पना में द्रव्यद्वय के समवाय की आपत्ति विषयभेद को सिद्धि में लाघव - अप्रजोजक विशिष्टबुद्धि में सम्बन्धाविषयकता की आपत्ति ११५ 'विशेष्य- विशेषण संबंध निमित्तकत्व - पृष्ठ ११६ ११७ साध्य नैयायिक परिष्कार ११८ साध्य में संबंचजन्यत्व का परिष्कार असंगत १२० तद्व्यक्तित्वरूप से समवायकारणता का समर्थन - नैयायिक १२१ गुणत्वादिरूप से गुणादि की कारणता का औचित्य - जैन १२२ किया में गुणवैशिष्टय बुद्धि की आपत्ति नैयायिक १२२ बुद्धि का वैलक्षण्य जातिरूप या विषयतारूप ? - जैन सम्बन्धांश में.... इत्यादि परिष्कार व्यर्थ भासमानसंबंध प्रतियोगित्वरूप प्रकारता में अतिप्रसंग १२४ स्वरूपतः भासमान सम्बन्धप्रतियोगित्व में भी अनिष्ट १२४ स्वरूपसंबंध समवाय का उपजीवक नहीं है १२५ समवाय पक्ष में लाघव की बात असार १२६ विनिगमनाविरह से समवायसिद्धि अशक्य १२७ रूप-अरूपी व्यवस्था की समवायवाद १२२ १२३ में अनुपपत्ति १२८ सम्बन्ध होने पर अधिकरणता का नियम नहीं है १२८ ११ विषय १२६ तद्वृत्तिता नियामकत्व का अर्थ है तद्विशिष्ट वृद्धि का जनकत्व वायु में वह रूपं बुद्धि के प्रामाण्य की उपपत्ति १२९ निरवच्छिन्नसम्बन्ध अधिकरणता का नियामक नहीं हो सकता अनेक समयायवादी का पूर्वपक्ष अनेक सममायवादी पक्ष में अति गौरव दोष - उत्तरपक्ष १३१ अनुगत सम्बन्धप्रतीति के बल से समवायसिद्धि अशक्य १३२ वैशिष्टसम्बन्ध में पटाभाव प्रत्यक्ष पृष्ठ १३० १३० की आपत्ति नैयायिक १३२ कपिसंयोग के दृष्टान्त से उक्त आपत्ति का परिहार जैन १३३ नाश की व्यवस्था में समवाय जरूरी नैयायिक १३४ स्वप्रतियोगिवृत्तित्व विशिष्ट सत्तावत्त्वरूप से कारणता का आपादन द्रव्य-जातिभिन्न के चाक्षुष की प्रति १३५ बन्धकता से समवाय सिद्धि ? प्रतिबन्धकता में समवेत पद की १३६ अनावश्यकता १३६ [का० ६६ ] सामग्रीपक्ष की कल्पना प्रयोजनशून्य है १३७ बुद्धि विजातीय कार्यों की उत्पत्ति असंभव १३७ सामग्री और उसके घटक से विभिन्न कार्यों का असंभव १३८ कारणगत सामर्थ्य में स्वभावभेद १४२ कल्पना अयुक्त १४० सम्मिलित कारणों के सामर्थ्य से कार्योत्पत्ति असंगत प्रत्येक जन्यत्वस्वभावपक्ष में अन्य दोष एक व्यक्ति में अनेक सामथ्यं का असंभव १४४ अनेक सामग्री से अनेक कार्योत्पत्ति असंगत १४५ १४३
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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