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________________ ५८ ] [शा. वा.समुच्चय स्त:-४ श्लोक ३७ 'तदेव न भवति' एतत् यत् परेणोक्तम् तद् विरुद्धमिव लक्ष्यतेच्याइतमिव दृश्यते कथम् ? इत्याह-'तदेव' इत्यनेन वस्तुसंस्पर्शातू अविकृतवस्तुपरामत भवनपतिवेधतः भवननिषेधात् 'भवनमभवनम्' इत्यापत्तेः, एवं च निषेधमुखेनैव विधिसमावेशात तदा सत एबाऽसायं व्यवस्थापितवान् देवानाप्रियः । "तद् यदि तदाऽसत स्यात् प्रागपि तथा स्यादिति तत्पदपरामृष्ट सांवृतमेव निषिध्यत' इति चेत् ? तर्हि तद्वस्तुनस्तदवस्थत्वाद् वृथैव क्षणिकता प्रसाधनप्रयासः । स्यादेतत्-घटनाशस्य क्षणिकन्वेऽपि न प्रतियोग्युन्मज्जनापत्तिः, तन्नाशनाशादिपरम्परानधिकरणतत्प्रागभावानधिकरणक्षणस्यैव तदधिकरणत्वच्याप्यत्वादिति । मैवम्, लाघवेन तदभावानधिकरणत्वेनैव तदधिकरणत्वव्याप्तिकल्पनात् , सभागसन्ततौ तन्नाशक्षणे सज्जातीयस्वीकारेण बीजाकुरवदुन्मज्जनापत्ते? निवारत्वात् , तन्नाशादिपरम्पराया दुहत्वेन तद्घटितक्षणिकत्वस्य दुर्ग्रहत्वाच्वेति दिक ॥३७॥ बौद्ध की ओर से जो 'गभावो भवति' का तात्पर्य स एव मावो न भवति' इस अर्थ में बताया गया है वह विरुद्ध असा प्रतीत होता है क्योंकि स एव भावो न भवति' इस वाक्य में तत् स शब्द से अविकृत (वास्तधिक) वस्तु का हो परामर्श होता है, क्योंकि अधिकृत वस्तु ही अपने उत्पत्ति क्षण में गृहीत होती है और तत्पद पूर्व गृहीत वस्तु काही परामर्शक होता है । इस प्रकार तत्शब्द से अधिकृत वस्तु का परामर्श कर के भवन का निषेध करने से 'स एव न भवति' का तात्पर्य "भवनमभवनम् ' इस रूप में प्रसक्त होता है । फलतः निषेध मुख से ही विधि का प्रतिपावन होने से तत्काल में सत् पदार्थ का ही प्रसत्त्व व्यवस्थापित होता है. जिससे, 'प्रमाको भवति' का 'भावो न भवति' इस अर्थ में विवरण करने वाले बौद्ध का देवताओं का प्रियत्व'मोदय सचित होता है। यदि इस के विरोध में यह कहा जाय कि-"पूर्वक्षणोत्पन्नभाव यदि द्वितीयक्षण में असत् ही होगा तो पूर्व क्षण में भी प्रसत् ही होगा. इस प्रकार तत्पद से सांवृतिक (काल्पनिक) सत् भाव का ही परामर्श करके उसका निषेध किया जाता है।"-तो यह ठीक नहीं है। क्योंकि द्वितीयक्षण में सांवृत का हो निषेध मानने पर पूर्वक्षण में उत्पन्न प्रामाणिक-पारमाधिक वस्तु की द्वितीयक्षण में यथावत् स्थिति बनी रहेगी। फलतः क्षणिकता के साधन का प्रयास हो व्यर्थ होगा। यदि यह कहा जाय कि-'भणिकत्वयायो का यह अभिप्राय है कि पूर्वक्षण में उत्पन्न घट का द्वितीयक्षण में ना उत्पन्न होता है और उत्पन्न होने के नाते यह भी क्षणिक होता है किन्तु इसके क्षणिक होने पर भी प्रतियोगी के पुनर्भाव-पुनर्वर्शन को प्रापत्ति नहीं होगी। क्योंकि सब वस्तु का नाश और उसके नाश प्रादि की परम्परा का प्रधिकरण और तद्वस्तु के प्रायमरय का अनाधिकरण जो क्षण उसी में तद्वस्तु के प्रधिकरणत्व का नियम है । इसलिए भाव के उत्तरक्षण में भाव का नाश और उसके नाशादि होते रहने पर भी उसमें भावाधिकरणत्व न होने से उसके उन्मज्जन को प्रापत्ति नहीं हो सकती"। किन्तु यह ठीक नहीं है । कारण, तवमावानधिकरणत्व में तवधिकरणत्व की व्याप्ति मानने में लायव है । सभागसन्तति प्रर्थात् सजातीयसन्तान में सन्तानघटक पूर्वभाष के नाशक्षण में
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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