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________________ ५५ ] [ शा.पा. समुच्चय स्त०५-श्लो० २४ -- न, नत्र उभयत्र संबन्धेन गच्छन्यपि चैत्रे 'न गच्छति' इति प्रयोगयोग्यतापादनस्य तात्पर्यसत्त्वे इष्टापत्त्या निराससंभवेऽपि 'जाती समवायेन न गगनजाती' इत्यस्यानुपपतेः, गगन जात्युभयत्वावच्छेदेन जातिवृत्तित्वाभाववत्समरायवैशिष्ट्याभावाभावात् ; द्वित्वसामानाधिकरण्येन तद्वोधे च 'घटे सत्ता तद्धिन्नजाती न स्तः' इत्यस्यापि प्रसङ्गात् । एवं च 'हृद-पक्तयोर्न वह्निः' 'शिखरविशिष्टे पर्वते न वह्निः' इत्यादि प्रतीत्या व्यासज्यवृत्तिविशिष्टधर्मावांच्छन्नाधिकरणताकाभावाभ्युपगमेन घटवत्यपि 'घटपटो न स्तः' इत्यस्य 'गुणे न गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्ता' इत्यस्य चोपपादनेऽपि न निर्वाह इति दिक । वस्तुतः श्रुतज्ञानस्थलीयक्षयोपशमपाटवाद समनियतपर्यायाणामेकतरभानेऽन्यतरभानमप्यावश्यकम् , इति सिद्धं भावाऽभवनबानेशानदवार ६ - के साथ सम्बन्ध मान कर जातिवृत्तित्वाभाववत् समवायवैशिष्ट्याभाव का गगन में बोध माना जा सकता है । अत: नंयायिक का यह मत ठीक ही है कि सप्तम्यन्त पद एवं नञ् पर घटित वाक्य से प्रथमान्त पवार्थ में सप्तम्यन्त पदार्थ निरूपित वत्तित्यामाद का ही बोध होता है न कि प्रथमान्तपदार्थ के अभाव में सप्तम्यन्त पदार्थ निरूपित वृत्तिता का"। [नव्य मत में नवीन अनुपपत्तियां] किन्तु व्याख्याकार के कथनानुसार यह नैयायिक मत प्रसङ्गत प्रतीत होता है । क्योंकि शिस समय चैत्र गमन कर रहा है उस समय 'चेत्रौ न गच्छति' इस प्रयोग की मापत्ति हो सकती है । क्योंकि नजथं का दो बार भान मानने पर चत्र में गमनाननुकूल कृति प्रभाव के बोध के तात्पर्य से उक्त वाक्य का प्रयोग सर्वथा सम्भव है । क्योंकि जिस समय चैत्र केवल गमन करता है और कोई कार्यान्तर नहीं करता उस समय उसमें गमनाननुकुल कृति का प्रभाव अक्षुण्ण होता है। यदि यह कहा जाए-उक्त प्रकार के बोध में वक्ता का तात्पर्य रहने पर गमनकर्ता चैत्र में चित्रो न गमछति' इस प्रयोग को सम्भावना इष्ट है अतः इस प्रकार को प्रापत्ति का उद्भावन उचित नहीं है, तो भी इस पक्षका समर्थन नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर "जातौ समवायेन न गगनजाती" इस प्रयाग को अनुपपत्ति होगी । क्योंकि जाति में जातिनिरूपितत्वाभावयत्समवाय का वैशिष्टय रहने से गगन-जाति उभय में तादृशोमयत्वावच्छेवेन जातिनिरूपितत्वाभाववत् समवायवैशिष्टचामाय नहीं रहता। और यदि इस वाक्य को उपपत्ति के लिए गगन-जाति उमय में द्वित्वसामानाधिकरण्येन उक्त वैशष्टयामाव माना जायेगा तो घटे 'सत्ताद्भिन्नजाती न स्तः' इस प्रयोग को प्रापत्ति होगी। क्योंकि ससा-तद्भिनजाति गत उभयत्व के आश्रय पटत्यादि जाति में घटसमवेतत्व का प्रभाव रहता है। प्रतः उक्त बोध के यथार्थ होनेसे उक्त बाक्य के प्रामाण्य की प्रापत्ति होगी। जब कि सत्ता और सत्ताभिन्न घटत्वादि जाति में घटसमवेतत्व के रहने से उक्त वाक्य का प्रामाण्य इष्ट नहीं है। केवल घदाधिकरण देश में अत्र 'घटपटौं न स्त: यह प्रयोग होता है एवं गुणे न गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्ता' यह भी प्रयोग होता है। किन्तु इसकी उपपत्ति भी 'घटपटोभयस्वावच्छेवेन एतद्देशवृत्तित्वाभाष' एवं
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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