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________________ २२] [शा. वा. समुरचय स्त.-४ श्लोक १३ - - - - पराभिप्रायमाह मूलम-स क्षणस्थितिधर्मा चेद् द्वितोयादिक्षणाऽस्थिती। युज्यते हयेतदप्यस्य तथा चाक्तानतिक्रमः ॥१२॥ साभाचनाशः, क्षणस्थितिधर्मा-भाव एव । अयं भावः-द्विविधो धस्माकं विनाशः, सांव्यवहार्यः, तात्विकश्व | आयो निवृत्तिरूपः, द्वितीयश्च भावरूपः । तत्र कार्यकाले कारणनिवृत्तिविकल्प आयमेव नाशमवलम्बते । वस्तुव्यवस्थापक्रत्वाद्य एव । एतेन 'कार्योत्पत्तिकाल एब कारणविनाशाभ्युपगमे कारणोत्पादरूपत्वात तस्प सहभावेन कार्य-कारणभावव्यवस्थोत्मादेन , कारणोत्पादात कारणविनाशस्य भिन्नत्वाभ्युपगमे च कृतकत्वस्वभावत्वमनित्यत्वस्य न भवेत् , व्यतिरिक्ते च नाशे समुत्पन्ने न भावस्य निवृत्तिः, इति कथम क्षणिकत्वम् ? इत्यध्ययनाविडकीयोतकरादीनामपि मतं परास्तम् । अत्राह-इनि चेत् १ एतदपि क्षणस्थितिधर्मकत्वम् , हि-द्वितीयादिक्षणाऽस्थितौ सत्या, युज्यते, तथा चोक्तानलिफ्रमः उक्तदोपाऽपरिहारः ॥१३।। नाश नहीं होगा।"-यह मी ठीक नहीं है । ऐसा मानने पर असत्व की स्थिति सर्वकालीन होगी क्योंकि जिसका नाश नहीं होता उसको सावकालीन स्थिति देखी जाती है-जसे न्यायमत में प्राकाशादि । जब प्रसत सायंकालीन होगा तब भाव की उत्पत्ति के क्षरण में भी भाव का अस्तित्व नहीं हो सकेगा. क्योंकि प्रसत्त्व के सार्वकालीन होने से उस समय भी भाव का विरोधी असत्त्व यथावत् बना रहेगा ।।१२॥ [भावनाश को क्षणिक मानने में बौद्धों को उपपत्ति] पूर्वोक्त प्रापत्ति का परिहार बौद्ध जिस अभिप्राय से प्रस्तुत करते हैं उसका प्रतिपादन १३ / कारिका में किया गया है। बौद्धों का प्राशय यह है कि भाव का जो असरव अर्थात नाश होता है वह भी क्षणपर्यन्त-एकक्षरणमात्र रहनेवाला भाव ही है। न कि प्रथम क्षणोत्पन्न भाव का नाश द्वितीय क्षरण में होनेवाली कोई मायभिन्न वस्तु है। नाश के सम्बन्ध में बौद्धों का यह मत है कि उसके दो भेव होते हैं (११ व्यावहारिक नाश और (२) तात्त्विकनाश । व्यावहारिक नाश पूर्व भाव को निवृत्तिरूप होता है और तात्त्विक नाश उत्तरभाव रूप होता है। कार्य को उत्पत्तिकाल में कारण की निवृत्ति होती है, यह पक्ष भावनिवत्तिरूप प्राधनाश को ही अवलम्बन करता है । वस्तु का व्यवस्थापक मो यह प्राद्यनाश ही होता है अर्थात् वस्तु के स्वरूप का सम्पादक होता है । वस्तु को अस्तित्व भी बही प्रदान करता है, अर्थात प्रथम भाष को निवृत्ति से ही उत्तरभावात्मक वस्तु की उत्पत्ति होती है । पूच भाव के तात्त्विकनाश से उत्तरभाव की उत्पत्ति नहीं हो सकती क्योंकि पूर्वभाव का तारिककनाश उत्तरमाव स्वरूप ही है। इसलिये तास्विकनाश और उत्तरभाय के अभिन्न होने से कार्य-कारण साव नहीं हो सकता। इसलिये भावनियत्तिरूप व्यावहारिक नाश को ही उत्तरमाव का उत्पादक मानना उचित है।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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