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________________ २३० [शा. बा. समुच्चय स्त. ४ श्लोक ११. रूपपटरूपे' इत्यस्यानुपपादनात , घटरूपत्वादिस्वरूपाया आथेयताया उभयानिरूपितत्वात् । 'तत्र तद्वित्यादिस्वरूपैयाधेयते' ति चेत् ? द्वयोः प्रत्येकरूपावच्छेदेन द्वित्वाभावाद् निषेधस्यापि प्रवृत्तिः म्यात् । 'अनुयोगितावच्छेदकावच्छेदेनैव सप्तम्यर्थाधेयत्वान्वयव्युत्पत्ते यं दोष' इति चेत ? तथापि 'घट-फ्टयोर्न घटरूपा-ऽऽकाशे' इत्यादिकं कथम् ! एतद्वित्वादिस्वरूपाया आधेयताया उभयानिरूपितत्वात् , तात्पर्यवशात् द्वेधान्दयुभयस्यानार्थयस्वाभावात् ? अनुभवविरुद्धं च सर्वमेतत् कल्पनमिति न क्रिश्चिदेतत् । क्योंकि वह प्राधेयता इस स्थल में घटरूपत्वस्थप होगी प्रत: यह केवल घट से ही निमपित होगी, पट से निरूपित न होगी, अत: घटपटोभयविशिष्ट पदपादस्वस्वरूप प्राधेयता अप्रसिस होने से उस का निषेध नहीं हो सकता । यदि यह कहा जाय कि-'जैसे 'जातिघटयोन ससा' इस स्थल में सप्तमी विमक्ति के समवायसम्बन्धविच्छिनायता पथ में जाति-निरूपितत्व न होने से जाति-घट विशिष्ट समवायसम्बन्धावच्छिन्नाधेयता के प्रसिद्ध होने के कारण ससा में उक्त प्राधेयता के प्रभाव का बोधन मान कर प्राधेयता में ही निरूपितत्व सम्बन्ध से जातिघटोमयाभाव का प्रन्यय मानकर 'जातिघटयोनं सत्ता' यह वाक्य 'सत्ता निरूपितत्वसम्बन्धेन जातिघटोभयाभाववती प्राधेयता की प्राश्रय है' इस अर्थ में प्रमाण होता है, उसी प्रकार 'घटपट्योन घटरूपम्' यह वाक्य मी निरूपितत्व सम्बन्ध से घटपटोमयाभाववती घटरूपत्वस्वरूपाधेयता का प्राश्रय घटरूप है' इस अर्थ में प्रमाण हो सकता है।'-तो यह ठीक नहीं है क्योंकि 'घटपटयोन घटपम्' इस वाक्य के प्रामाण्य का उक्त रीति से उपपावन सम्मय होने पर भो 'घट पटयोघटरूप पटरपे' इस वाक्य के प्रामाण्य का उपपादन प्रशक्य होगा क्यों कि सप्तमी विभक्ति का अन्वयितावच्छे करूपाययता अयं मानने पर इस स्थल में सप्तमी विभक्ति का अर्थ होगा घटरूपत्व और पटरूपत्व स्वरूप प्रार्थयता और वे दोनों ही प्राघयता घटपटो. भय से निरूपित नहीं है। यदि यह कहा जाय कि-' उक्त स्थल में सप्तमी विभक्ति के प्रर्य का प्रचयिताक घररूपत्व और पटरूपस्व नहीं है किन्तु घर-रूप पटरूपगत द्वित्य है अत: वहाँ उक्त द्वित्वस्वरूपाधेयता ही सप्तम्यर्थ है। उसमें घटपटोमयनिरूपितत्व विद्यमान है। अतः उक्तवाक्य के प्रामाध्य में कोई बाधा नहीं है"-तो यह ठीक नहीं है क्योंकि घटपटोभयनिरूपित द्विस्वस्वरूप प्राधेयक्षा दित्वावच्छेदेन रहेगो । प्रत्येकलप-घटरूपत्व, पटरूपत्व प्रवरछेदेन घटरूप पटरूप में रहेमा । अत: उस प्रभाव के तारपर्य से 'धटपटयोन घटरूपपट रूपे' इस निषेधवाक्य के भी प्रामाग्य को प्रापति होगी। इस के समाधान में यदि यह कहा जाय कि-"सप्तमी विमक्ति के प्रथमस प्राधेयता का प्रन्वय प्रन्योगितावच्छेदकावच्छेदे नव होता है। इतः उस के प्रमाव का भी अन्वय अनुयोगिता वच्छेदकावच्छेदेनैव होगा क्योंकि न पद से अघटितवाक्य से जैसा बोध होता है-मअपद का सममि ध्याहार होने पर भी नार्थ के सम्बन्ध से प्रतिरिक्तांश में बसा ही बोष होता है प्रतः घटपटरूप पत द्वित्वावच्छेदेन घटरूप प्रौर पटरूप में घटपटोभयनिरूपित द्वित्वस्वरूप प्राधेयता के बाधित प्रमाणका बोधक होने से 'घटपटयोन घटरूपपटरू' इस वाक्य के प्रामाण्य की धापत्ति नहीं हो सकती'-तो ऐसा कहने पर भी दोष से मुक्ति नहीं मिल सकती क्योंकि 'घटपरयोमं घटरूपाकाशे' इस वापयरे
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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