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________________ २१४ ] [ शा० का समुरुपय स्त० ४-श्लो० १२० प्रकारेण, न्यायथाधितम्-अनुभवविरुद्धम् । तदानन्तर्यस्याऽप्येकान्तभेदे वक्तुमशक्यत्वाद् , युक्तिविरुद्धं च ॥१२०|| किं च उक्त रीति से 'सत् तज्जननस्वभावम्' अर्थात् 'मद् घट जननस्वमाया' इस शब्दार्थ का पर्यालाचन करने से ही कार्य में कारण के प्रन्वय का बोध हो जाता है । यदि यह शंका को जाय कि-'उक्त वाक्य से होने वाले बोध से मिट्टी द्रव्य में घट का निरूपितस्वादिस्वरूप प्रभेद होने से प्रभेदान्वयबोध की उपपत्ति नहीं हो सकती है क्योंकि यह तभी हो सकता यदि उक्त बोध घट का उपनायक यानी उपनयसंनिकर्ष बन सके। किन्तु वह ऐसा नहीं बन सकता है। आशय यह है कि सांसगिक ज्ञान यानी मुख्य विशेष्यताभिन्न प्रौर मुख्य विशेष्यता से साक्षानिरूपित प्रकारताभिन्न तनिष्ठ विषयतानिरूपकज्ञान तत् का उपनायक नहीं होता । कारण 'घटवभूतलम' इस ज्ञान के बाद संयोग का और 'रजतकालोनो घटः' इस मान के बाद रजत का उपनीत भान नहीं होता, किन्तु 'रजतम्' इसप्रकार रजतत्वप्रकारक रजतविशेष्यक मान के बाद रजतत्व और रजत का उपनीत ज्ञान होता है। इसीलिये रजतस्मृति के बाद समवायसम्बन्धेन रजतत्व प्रकारक अथवा तादात्म्यसम्बन्धेन रजतप्रकारक 'इवं रजतम्' इस प्रकार शुक्ति में रजतत्व का उपनीत भान होता है। यहां यह ज्ञातव्य है कि 'वस्तु अनन्तधर्मात्मक होती है और उन में किसी एक धर्म के प्राधान्य ज्ञान काल में अन्य समस्त धर्मों का भी प्रधानतया ज्ञेय धर्म के सम्बन्धरूप से या पृष्ठलग्न यानी परम्परा घटक रूप से मान होता है । जैसे 'अयं घट:' इस प्रतीति में घटत्व का घट में प्राधयता तथा स्वसमानाधिकरणयावद्धर्माश्रयता सम्बन्ध से भान होता है। अथवा उक्त प्रतीति में घटत्व में स्वसमानाधिकरणयावद्धर्माऽभेद उपलक्षणविधया भासित होता है । उपलक्षण विषया भासमान धर्म में प्रवच्छेदकता नहीं होती, अत एव उक्त प्रतीति में घटत्वनिष्ठ प्रकारता में निरच्छिन्नत्व सुरक्षित रहता है। अब यदि सांगिक ज्ञान को उपनायक माना आय तो एक धर्म प्रकारेण किसी वस्तका ज्ञान होने पर भी ज्ञाता में सर्वज्ञता को प्रापत्ति होगी क्योंकि उक्तप्रतीति घटत्व के सम्बन्ध रूप में प्रथवा घटत्व के पृष्ठलग्नपरम्परा के घटकरूप में यावद्धर्मों का भान होने पर उक्तज्ञानरूप उपनयसंनिकर्ष मे यावद्धर्मों का प्राधान्येन-संसर्गान्यविषयर्यायधया मी ज्ञान हो जायगा। सर्वज्ञता क्या है ? - स्थनिरूपित, * संसर्गतान्य, केवलायिधर्मनिष्ठप्रकारत्वाऽनिरूपित विष यतासम्बन्धेन सर्वत्र व्यापक ज्ञानवरच ही सर्वज्ञत्व है। उक्त ज्ञान उक्त रीति से एकधर्मप्रकारेण एकवस्तु के ज्ञाता में मो सम्पन्न हो जाता है। अतः उस में सर्वजत्वापत्ति होगी। प्रतः जब उक्त विध सासगिक ज्ञान उपनायक नहीं होता तो 'म घटजननस्वभावा' यह शान भो घट का उपनायक नहीं हो सकता । क्योंकि वह जान भी मनिष्ठमुख्य विशेषता प्रौर उस मुविशेष्यता से भिन्न स्वभावनिष्ठ साक्षात् प्रकारता मिन्न घटनिविषयता है । इसलिये उक्तज्ञान से मृत् में घट के अवयसिद्धि का अभ्युपगम नियुक्तिक है - ॐ विषयता में केबलान्वयिधर्मनिष्ठ प्रकार वानिरूपितत्व का निवेश प्रमेय स्वेन यतकिञ्चित घट का ज्ञान होने पर प्रमेयत्व सामान्य लक्षण प्रन्यासत्ति से सकल प्रमेयज्ञाता में सर्वज्ञत्व की आपत्ति के बारगाथं किया गया है। संमगतान्यत्व का निवेश एकधर्मप्रकारेण एकवस्तु के बोध में उस वस्तु के सम्पूर्ण धमों को संबन्धविधया जानने बाले छद्मस्थ में सर्वज्ञत्व को आपत्ति को बारणाथ किया गया है
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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