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________________ या कभीर भौदिदी लोमनः ] [ १९७ प्रतिनियमे च किमनिमित्तमर्थस्य ज्ञानहेतुत्वकल्पना ? ! 'ज्ञाने स्याकागधायकत्वादथों हेतुरिति' चेत् ? न अर्थन सर्वात्मना तत्र स्वाकाराधाने ज्ञानम्य जडनाप्रसक्तेः, उत्तरार्थक्षणवत् एकदेशन तदाधायकत्वे सांशनासक्तेः । 'समनन्तम्प्रत्ययस्य तत्र स्वाकागधायकत्वाद् न जडत्वम् ' इन्युक्तावपि समनन्तरप्रन्यया-ऽर्थक्षण योद्वयोरपि तत्र म्वाकागपकन्वे तज्ज्ञानस्य चेतना-ऽचेतनरूपद्वयापत्तेः । किश्श, तदाकारं तदुत्पन्नं तदुत्पत्तिसारूप्ययोयभिचारित्वादर्थेऽपि न प्रमाणं स्यात् । अर्थ यदाकारं यदुत्पन्नं यदध्ययस्यति नत्र तत्प्रमाणम् । नन्वत्र यदाकारं यदुत्पन्न विज्ञान मेवाऽर्थाध्यवमायं जनयतीत्यर्थः, उत तमेवेति, आहोस्चिज्जनयन्येचेति ? आये, विकल्पजायगा तो अर्थ में जानकारणत्व को कल्पना निष्प्रयोजन हो जायगी। यदि यह कहा जाय कि 'अर्थ ज्ञान में स्वाकार का प्राधायक होता है अत एव उसे ज्ञान का हेतु मानना प्रावश्यक है कि यदि तत्तज्ज्ञान के अहेतु से भी तत्तज्ज्ञान में प्राकार का प्राधान माना जायगा तो घटाविज्ञान में पटादि प्राकार के प्राधान को प्रापत्ति होगी। किन्तु यह ठीक नहीं है कि अर्थ से ज्ञान में अपने प्रकार का सर्वात्मना प्राधान माना जायगा तो ज्ञान उसी प्रकार जड हो जायगा जैसे पूर्व अर्थक्षण से उत्पन्न होनेवाला द्वितीय अर्थक्षण । यदि किसो अंश से प्रथं को जान में स्वाकार का प्राधायक माना जायगा तो ज्ञान सांश हो जायगा। (ज्ञान में जडचेतन उभयरूपता को आपत्ति) यदि यह कहा जाय कि- 'केवल अर्थ हो ज्ञान में अपने प्राकार का प्राधान नहीं करता किन्तु जान का समनन्तर प्रत्यय अव्यवहितपूर्वत्तिज्ञान भी प्राकार का प्राधान करता है अतः उस प्राकार के प्राधान से ज्ञान की चेतनता सुरक्षिस रहने से उस में जश्त्व की आपत्ति नहीं होमो' यह ठीक नहीं है। कि ऐसा मानने पर समनन्तर प्रत्यय और अर्थक्षण दोनों के वेतन और प्रचेतन दोनों प्राकार प्राप्त होने से ज्ञान में जड-चेतन उभयरूपता की आपत्ति होगी। दूसरी बात यह है कि 'जो तवाकार और तदुत्पन्न ज्ञान होता है वह तवयं में प्रमाण होता है। यह व्याप्ति भी नहीं है क्योंकि तदुत्पत्ति और तत्सारूप्य दोनों शुक्ति-रजत ज्ञान में व्यभिचारी है, कि शुक्ति में रजतज्ञान रजताकार होता है एवं रजतविषयक संस्कार प्रथवा रअतस्मरण द्वारा रजतोत्पन भी उसी प्रकार होता है जैसे योगी का ज्ञान योगजधर्म द्वारा प्रसन्निहित प्रतीत अनागत विषयों से उत्पन्न होता है किन्तु रजत रूप अर्थ में वह शुक्तिरजतज्ञान प्रमाण नहीं होता। (यदाकार, यदुत्पन्न, यदर्थनिश्चयजनक ज्ञान प्रमारण-यह प्रसंगत है) यदि यह कहा जाय कि-'जो ज्ञान यदाकार यदुत्पन्न होते हये जिस अर्थ के प्रध्यवसाय=निश्चय का जनक होता है यह उस अर्थ में प्रमाण होता है यह नियम है । शुक्ति में रजतज्ञान र जताकार रजतोत्पन्न होने पर भी रजत के अध्यवसाय का जनक न होने से रजतार्थ में प्रमाण नहीं होता । प्रतः इस नियम में व्यभिचार नहीं है'-तो यह ठीक नहीं है कि इस नियम को कल्पना तीन स्थितियों में की जा सकती है, किन्तु तीनों ही स्थितियां सम्भव नहीं हो सकती । जैसे, पहली स्थिति
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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