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________________ स्या० ० टीका-हिन्दीविवेचना ] । १४६ एच न्यावत्तिभेदेऽपि तस्यानेकस्वभावता। भावानापने सा चायुक्ताभ्युपगमक्षनेः ॥८॥ एवम् उक्तग्रकारेण, त्यावृत्तिभेदेऽपि विभिन्न कारणतावच्छेदके भेदविशेषेऽप्यङ्गीक्रियमाण, तस्य-वस्तुनः, बलादनेकस्वभावताऽऽपद्यते । सा चाऽभ्युपगमक्षतेः प्रतिज्ञातविरोधात , अयुक्ता । अथ 'आरोपे सति०'...इत्यादिन्यायेन रूपक्षणस्याऽगन्धजनकल्यव्यावृत्या गन्धजनकत्वाकल्पनायामप्यबुद्धिजनकव्यावृत्यादिना बुद्धयादिजनकत्वकल्पनाद् न दोष इति चेत् ? न, रूपत्वादिनाऽन्वय-व्यतिरेकग्रहेण रूपत्वादिनैव रूपादेवु द्वयादिहेतुन्चौचित्यात् । इतरव्यावृत्ते? ग्रहत्त्वाद् , कल्पनातः कारणतावच्छेदकत्वांश इव कारणतांशेऽप्यनाश्वासान् , स्वलक्षणाऽसंस्पर्शेऽपि कल्पनाप्रसरात , व्यावृत्तिभेदस्थापि स्वलक्षणसंस्पर्श च व्यावृत्तिभेदानुम. तनानाक्षणवृत्तित्वस्यापि स्वलक्षणसंस्पर्शप्रसङ्गात् । व्यावृत्तिभेदेन कारणक्षणानां कार्यक्षणानां चानुगमे एकैकाहविनिर्मोकाम्यामविनिगमात् , विशिष्य हेतुताग्रहे चोपायाभावादिति अन्यत्र विस्तरः ॥४॥ कहा जाय कि रूपक्षण में अगन्धजनकम्याधत्ति का प्रभाव होने से उसे गन्धजनक नहीं कहा जाता तब तो ऐसा कहने का अर्थ यह हुमा कि उस में प्ररूपजनकल्यायत्ति ग्रादि का माव है, यानी इन दोनों का पारमार्थिक अस्तित्व प्रसक्त होगा ॥३॥ ८४ वो कारिका में उक्त प्रसक्ति से बौद्ध को होनेवाली अनिष्टापत्ति का प्रदर्शन किया गया है [ एकान्त एकस्वभावता मानने में विरोध ] उक्त रोति से रूपक्षण में यदि अबुद्धिजनकल्यावृत्ति प्रौर अरूपजनकच्यावत्ति जैसे विभिन्न कारणतावच्छेदक की पारमार्थिक सत्ता मानने पर रूपक्षण में अनेकस्वभावता को बलात् प्रापत्ति होगी, जो बौद्ध के लिये प्रयुक्त है। क्योंकि एकवस्तु में अनेकस्वभावता को प्रसक्ति होने पर बौद्ध के इस अभ्युपगम-इस प्रतिज्ञा का-कि 'वस्तु एकान्तत: एकस्व माव ही होती है अथवा सर्वस्वभावविनिमुक्त स्वलक्षण होतो है'-विरोध होगा। इसके उत्तर में पुनः बौद्ध की पोर से यदि यह कहा जाय कि-"प्रारोपे सति निमित्तानुसरणम् , न तु निमित्तमस्तीति प्रारोप;" यह न्याय है, इसके अनुसार जो प्रारोप प्रामाणिक एवं सप्रयोजन हो उसके लिये तो निमित्त की कल्पना उचित है, किन्तु निमित्त की कल्पना करके नैमित्तिक (प्रारोप) को कल्पना नहीं की जा सकती । अतः रूपक्षण में अगन्धजनकव्यावृत्ति की कल्पना करके गन्धजनफस्व की कल्पना करना न्याययुक्त नहीं है फिर भी अबुद्धिजनकल्यावत्ति की कल्पना करके बुद्धिजनकत्व और रूपजनकल्यावृत्ति को कल्पना करके रूपजनकत्व को कल्पना करने में कोई दोष नहीं है । प्राशय यह है कि रूपक्षण में बुद्धिजनकत्व और रूपजनकत्व का व्यवहार लोकसिद्ध है प्रत एव उसकी उपपत्ति के लिये अबुद्धिजनकव्यावृत्ति और अरूपजनकव्यावृत्ति की कल्पना तो न्यायसंगत है, किन्तु रूपक्षण में गम्घ
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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